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Pursuit of Happiness in Lockdown and Beyond…

Thank you, Mr. and Mrs. Anand and Suneeta Ganu at Garje Marathi for organizing the webinar today. I hope that the message of positivity reaches those in need and people benefit by this. Here is the recording of the webinar!

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You are Invited!

Covid-19 has presented some very interesting times. It is very important to have a dialogue in these difficult times about how to try to be happy in these circumstances.

Garje Marathi Global has kindly organized my talk. I hope you will join us!

https://www.eventbrite.com/e/pursuit-of-happiness-in-lock-down-and-beyonddrashwini-mokashi-tickets-105693875226

On 16 May 2020, Honorable Minister Shri. Nitin Gadkariji addressed GMG members via Video Conference. Please watch this inspiring video recording of the event: https://youtu.be/bUkxskpDujg

Opening remarks by Anand Ganu will give you good idea about GMG’s current status and future plans. Anand GanuFounder & President Garje Marathi Global Inc. www.garjemarathi.com  +1 7327897130

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Philosophical Counseling Practice

Certified by American Philosophical Practitioners Association (www.appa.edu)

‘Sapiens and Sthitaprajna’ the book by Dr. Ashwini Mokashi, has been recognized by American Philosophical Practitioners Association as a text and reference material.

Dr. Ashwini Mokashi has helped people through her writings, teaching, in-person and public talks. Some psychologists follow her recommendations in their practice.

In this era of Covid-19, Dr. Ashwini Mokashi counsels clients online via skype or zoom. She specializes in moral dilemmas, career change, seeking meaning of life, difficult decisions, strategic thinking, anxiety over the pandemic, relationship difficulties.

Philosophical counseling is a dialogue with the client, to analyze one’s beliefs and learn to formulate rational beliefs to figure out appropriate solutions. It is a counseling practice for people from any background. Her specialization is in using the Stoic ideas and the ideas from the Bhagavad-Gita to ease the pain in life and take us on the road to happiness.

To arrange a session, please contact her at philosophyandhappiness@gmail.com or call her at 609-250-2526

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खुशी का पैमाना

Photo by Anthony on Pexels.com

लेखिका: अश्विनी मोकाशी, Ph.D. ©

हर साल 20 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय खुशी दिवस मनाया जाता है। कोरोनवायरस, कर्फ्यू और सामाजिक दूरी, घर से काम करना, वर्तमान स्थिति में खुश रहना बहुत ही असंगत और असंभव लगता है। लेकिन शायद आप इस समस्या को कुछ हद तक हल कर सकते हैं। यदि आप भगवद्गीता और स्टॉइकवाद में वर्णित खुशी की अवधारणा को जानते हैं, तो आप अपने आप को तदनुसार संतुलित और खुश रखने के तरीके की संतुष्टि पाएंगे। इस समस्या का समाधान और उत्तर यह है कि हम खुशी को कैसे मापते हैं और इसके लिए हम क्या उपाय करते हैं।

खुशी को कैसे मापें

हम अक्सर इस शब्द का उपयोग करते हैं कि हम आज कैसा महसूस करते हैं, चाहे हम आज खुश हों या दुखी। यदि हम भगवद गीता में बताई गई शर्तों या स्टॉइक दार्शनिकों द्वारा निर्धारित शर्तों पर विचार करते हैं और उनके द्वारा निर्धारित खुशी के मानदंडों पर विचार करते हैं, तो हम पैमाने को निम्नानुसार देखेंगे। इस माप में, 1 सबसे कम खुश है और 5 सबसे अधिक खुश है:

१. बेहद दुखी

२. कुछ हद तक दुखी

३. संतुलित

४. कुछ हद तक खुश

५. बहुत खुश

‘बेहद दुखी’ होने का पहला चरण भुगतना है। उदाहरण के लिए, किसी प्रियजन को खोने या दिवालिया होने, इतने बड़े नुकसान से निपटने के भावनात्मक बोझ को सहन करने में सक्षम नहीं होना, और परिणामस्वरूप कार्य करने और निष्क्रिय होने में सक्षम नहीं होना।

कुछ हद तक दुखी ’होने का दूसरा चरण किसी तर्क या किसी गलती के कारण किसी से चिढ़, नाराज, दुखी होने की स्थिति है। ऐसे उदाहरण हो सकते हैं जहां आपका फोन या कोई सॉफ्टवेयर खराब हो गया है, या आपको काम के दौरान खराब प्रतिक्रिया मिल रही है, या कोई आपकी लगातार आलोचना कर रहा है।

’संतुलित’ होने का तीसरा चरण अपने दैनिक कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने और बिना किसी बाधा के अपने कर्तव्यों को पूरा करने में सक्षम होना है।

कुछ हद तक खुश ’होने का चौथा चरण किसी घटना के बारे में उत्सुक होने की स्थिति है, किसी को देखने के लिए उत्सुकता से, अच्छी खबर की उम्मीद है, और एक अच्छे मूड में है।

‘बेहद खुश’ होने का पांचवा चरण शायद ही कभी अनुभव किया जाता है। उदाहरण के लिए, आपके बच्चे का जन्म, पहली नौकरी जो आपको मिलती है, प्यार में पड़ना और प्यार का जवाब मिलना, जब आप बेरोजगार होते हैं तो बड़ी लॉटरी हासिल करना। जीवन में किसी समय आनंद की ऐसी स्थिति का अनुभव होता है।

अपनी खुशी को परिभाषित करें

जब हम कहते हैं कि हम आज इतने खुश नहीं हैं, तो हम मूल रूप से खुद से कह रहे हैं कि मेरे पास खुश रहने की एक परिभाषा है, और यह परिभाषा मेरी वर्तमान स्थिति या मेरी वर्तमान मनःस्थिति से मेल नहीं खाती है। इसलिए, मैं खुश नहीं हूं। यह निष्कर्ष किसी को भी दुखी करता है। तो, खुश रहने की आपकी परिभाषा क्या है,  हम सोचते हैं कि हमें उपरोक्त अनुक्रम में कहां होना चाहिए – वह है, तीसरा, चौथा या पांचवा स्थान। कई कारण हो सकते हैं कि आपकी मन की वर्तमान स्थिति और आपकी खुशी की परिभाषा मेल नहीं खाती है। आपको अच्छी खबर की उम्मीद हो सकती है, लेकिन यह जल्द नहीं आ रही है। आप इस बुरी स्थिति से जल्द ही दूर जाने की उम्मीद कर सकते हैं, लेकिन यह नहीं है। हो सकता है कि आपको चिढ़ हो रही हो और वह जलन अपने आप दूर न हो। यदि आप इसे तार्किक रूप से देखते हैं, तो आप पाएंगे कि इसका उत्तर आपकी मानसिक स्थिति और आपकी वर्तमान स्थिति को एक-दूसरे से संबंधित करना है या आपकी खुशी की परिभाषा को बदलना है। उदाहरण के लिए, हम इस बात की परिभाषा बदल सकते हैं कि हमें किस स्तर की खुशी चाहिए, या हम सोच सकते हैं कि हमारी वर्तमान मनःस्थिति ठीक है। गीता में वर्णित आनंद की स्थिति को मन की स्थिर स्थिति के रूप में जाना जाता है। ऐसी स्थिति में, खुशी और लाभ और हानि दोनों समान हैं। ऐसे व्यक्ति ने दुःख को पचाने या खुशी को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण पाया है। खुशी और अनुभव की उनकी स्थिति, कभी-कभी परिवर्तनों को छोड़कर, हमेशा के लिए रहती है।

अब गीता और स्टॉइक दार्शनिक की एक ही परिभाषा है। एक खुश व्यक्ति अपने माप के अनुसार # ३ स्थिति में एक संतुलित स्थिति में है। यदि आप समय-समय पर # १ या # ५ पर हैं, तो आप स्थिर नहीं हैं। ऐसा करना अलग हो सकता है, उदाहरण के लिए हम किसी नुकसान या हानि से दुखी होते हैं या हम कुछ लॉटरी जीतने के बारे में खुशी के चरम पर होते हैं। ये घटनाएँ शायद ही कभी हमारे जीवन में घटित होती हैं। कभी-कभी वे बहुत कम समय में हो सकते हैं, लेकिन यदि कोई जीवन के सौ साल गिनता है और किसी के जीवन में बहुत नुकसान या महान लाभ देखता है, तो एक सांख्यिकीय दृष्टिकोण से ऐसी महान घटनाएं हर दिन, हर महीने या हर साल नहीं होती हैं। उदाहरण के लिए, यदि हम अपने जीवन में केवल दो बार अपने माता-पिता को खो देते हैं या यदि हम यह मान लेते हैं कि किसी के दो बच्चे हैं, तो बच्चे होने की खुशी केवल दो बार होती है। इसलिए यदि बड़ा आनंद या बड़ा दुख है, तो यह सौ साल में केवल दो बार होगा। इसके अलावा, मृत्यु अपरिहार्य है, इस न्याय से सहन करने की शक्ति देता है। इसी तरह लक्ष्मी चंचल है, इसलिए यह अवश्यंभावी है कि पैसा आएगा या जाएगा, इसलिए हम हैरान नहीं हैं।

वर्तमान में सामाजिक दूरी रखकर, घर से काम करके, अगर हम अपने दैनिक जीवन को जारी रखने के लिए साहस बढ़ा सकते हैं, और बुरी खबरों को अपरिहार्य समझकर सुरक्षित रहने के लिए आभारी हैं, तो यह संतुलन और खुशी का संकेत है। यह विचार आपको अपने जीवन में संतुष्ट रहने और स्थिति पर काबू पाने में मदद करेगा।

सावधान रहें और संतुलित रहें!

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उपनिषदों के द्वारा भय का समाधान

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लेखिका: अश्विनी मोकाशी, Ph.D. ©

परिचय

वर्तमान समय में कोरोना महामारी के डर से, घर में मजबूरी से रहने के कारण चिंता विकार बढ़ रहा हैं। लोग जीवन के बारे में सामान्य चिंता से पीड़ित हैं और वे निष्क्रियता तक जाकर चिंता करते हैं। निष्क्रियता के कारण भय और असुरक्षा हैं; जैसे की आगे क्या होगा इसकी चिंता, मृत्यु या दुख का भय, लाभ या हानि का भय, असफलता का भय, तनाव की चिंता आदि। चिंता करने से मदद नहीं मिलती है, लेकिन किसी व्यक्ति की उत्पादकता कम हो जाती है और मन की शांति गायब हो जाती है। चिंता ही चिंता का कारण बन जाता है। क्या मैं वर्तमान महामारी से बच पाऊंगा? क्या मेरा आर्थिक नुकसान होगा? इस तरह के सवाल आत्म-संदेह की प्रक्रिया शुरू करते हैं और आत्मविश्वास घटाते है, जिससे हम लाचारी महसूस करते हैं और असहायता की भावना उत्पन्न होती हैं। इस लेख में हम विकासवादी और उपनिषद के दृष्टिकोण से चिंता या भय की इस भावना के कारणों की जांच करेंगे और उपनिषदों में बताये गये मार्ग का विश्लेषण करके देखेंगे कि वे इस समस्या पर क्या प्रकाश डालते हैं, इस समस्या का क्या समाधान है।

विकासवादी जीवविज्ञान (Evolutionary Biology) से भय का विश्लेषण

विकासवादी जीव विज्ञान के दृष्टिकोण से, शिकारी जानवरों के समुदाय के मनुष्यों को जंगली जानवरों या अन्य साथीयों के हमले से बचने के लिए डरने की जरूरत थी। इसने मन की सतर्क स्थिति में रहने में मदद की, ताकि वे खुद को किसी भी खतरे से बचा सकें। यदि वे बहुत अधिक आराम करते हैं या बहुत खुश होते हैं, तो इससे उनका निधन हो सकता था। दुनिया अब पहले से कहीं अधिक शांतिपूर्ण स्थिति में है। जंगली सूअर के हमले की चिंता किए बिना लोग शांति से सोते हैं। वे अपनी दिनचर्या को सामान्य मानते हैं, जब तक कि वे एक युद्ध क्षेत्र में या प्राकृतिक संकट में नहीं होते हैं, जैसे कि जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़ या एक नए वायरस के कारण होने वाली महामारी। हम में से अधिकांश वर्तमान में एक बहुत ही सभ्य समाज में रहते हैं, फिर भी भय की वृत्ति हमारे साथ बनी हुई है। लोग मामूली चीजों से डरते हैं, जैसे कि उनकी जीवन शैली, स्थिति, स्वास्थ्य, धन, या ऐसा कुछ, लेकिन उनका अस्तित्व हमेशा दांव पर नहीं होता है। यह निश्चित रूप से एक की मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है और हमें अस्थिर बनाता है। लोग रोजाना अपनी जान गंवाने के डर से नहीं जी रहे हैं, और फिर भी उनकी चिंताएं इतनी गहरी हैं कि वे लोगों को निष्क्रिय कर सकती हैं। कोई अपने आप से यह नहीं कहता कि ओह, क्या आराम है – यहाँ पे कोई जंगली जानवर नहीं है, यह सिर्फ मेरा मालिक (बॉस) है जो मेरी तरफ आ रहा है। मालिक को जंगली जानवर, और एक आतंक के समान खतरे के रूप में हम समझ लेते है।

तैत्तिरीय और बृहदारण्यक उपनिषदों से विश्लेषण और कहानियां

उपनिषदिक दृष्टिकोण से, भय और असुरक्षा अपने आप में विश्वास की कमी के कारण होती है, जो बदले में अपने आप को या एक व्यक्ति के आत्मन को न समझने के कारण होती है। जब कोई अपने आप को ब्रह्मांड में एक छोटे कण (जैसे परमाणु या अणु ) के रूप में सोचता है, जिसका कोई प्रभाव नहीं है, जो किसी से या किसी भी चीज़ से जुड़ा नहीं है, जो ब्रह्मांड का हिस्सा नहीं है, विश्व का निर्माण करने में या संभाल करने में जो भाग नहीं लेता है। फिर ऐसा व्यक्ति अपने अस्तित्व, या जीवन के उद्देश्य या अपने कर्म को ज्यादा महत्व नहीं देता है। अगर किसी को यह समझ में नहीं आता है कि कोई व्यापक दुनिया से कैसे जुड़ा हुआ है और इस बात से भी अनजान है कि दुनिया इन रिश्तों के कारण कैसे काम करती है और हम में से प्रत्येक को संसार के प्रभावी कामकाज के लिए सही तरीके से काम करने की क्या आवश्यकता है। हमारा संसार, हमारा विश्व हमारे परिवार, कार्यस्थल, स्कूल या सामाजिक संबंधित लोगों से जुड़ा हुआ है। जो इस बात को नहीं समझता, वह अपने आप को औरों से अलग कर लेता है। कोई अपने आप को असंगत मानता है, इस विश्वास की ओर जाता है कि ‘हमारे होने न होनेसे किसीको कोई फर्क नहीं पड़ता, हमारे विचार और भावनाएं मायने नहीं रखतीं, और कोई भी हमारे लिए परवाह नहीं करता ’।

तैत्तिरीय उपनिषद[1] के अनुसार, भय और असुरक्षा इस भावना से पैदा होती है कि हम बाकी सृष्टि से अलग हैं। यदि हम खुद को पूरी तरह से अद्वितीय समझते हैं और हम अपनी इच्छाओं और पसंद और नापसंद द्वारा अपने अस्तित्व को समझ लेते हैं। तो हम यह सोचना शुरू करते हैं कि दूसरों से अपने आप को, हमारे मतभेदों को कैसे बचाया जाए। हम एक उद्देश्य के साथ इस दुनिया में आये है, इस पर हम भरोसा नहीं करते हैं। जब हम मानते हैं कि यह दुनिया ब्रह्मतत्त्व की रचना है और यह ब्रह्मतत्त्व हर जगह अस्तित्व में है, अपने आप में और अन्य लोगों में आत्मन के रूप में मौजूद है, तब हम हमारे जीवन के उद्देश्य के साथ-साथ इस दुनिया के उद्देश्य में भी अधिक विश्वास करते हैं।

जब हम विशिष्टता की भावना का पोषण करते हैं, तो हम अपने आप पर, अपनी इच्छाओं पर ध्यान केंद्रित करते हैं और उन्हें पूरा करने में जुटे रहते हैं। इच्छा-पूर्ति सिद्धांत जन्मों और पुनर्जन्मों के चक्र की ओर ले जाता है, जो स्वयं एक भयभीत प्रस्ताव बन जाता है। हम खुद को ब्रह्मतत्त्व के पालन करनेवालों के रूप में नहीं देखते हैं जो अधिक से अधिक अच्छे के लिए एक उद्देश्य को पूरा कर रहे हैं, लेकिन उस रूप में जो विशिष्ट रूप से हमें जो भी करना चाहते हैं वो करने के लिए हमारी पैदाईश हुई हैं। तब हम खुद को आत्मन के रूप में नहीं देखते हैं, जो सभी में रहता है, लेकिन एक व्यक्ति के रूप में, जो दूसरों से अलग है।

सभी के बीच समानता का अर्थ यह नहीं है कि हम किसी अन्य व्यक्ति के जैसे ही हो। हम अपने कर्म, अपने भाग्य, अपने लक्ष्य और अपने पथों के साथ अपने व्यक्तित्व को लेकर चलते हैं। मनुष्यों के बीच मतभेदों के बारे में कोई इनकार नहीं करता है। फिर भी जो हमें एक साथ बांधता है वह यह है कि हम सभी का एक स्व है (individual Self या आत्मा), जो सार्वभौमिक स्व (universal Self या ब्रह्मतत्त्व) से संबंधित है। उस संबंध में, हम समान हैं।

बृहदारण्यक उपनिषद[2]  हमें एक कहानी देता है कि कैसे शुरुआत में, स्व भयभीत था और जब स्व ने महसूस किया कि यह एक है और कोई अन्य नहीं है, तो यह भय की सभी भावना को खो देता है। बाद में यह खुद से ऊब गया, इसलिए यह अपने आप से पुरुषों और महिलाओं में विकसित हुआ। इसलिए, सभी पुरुष और महिलाएं स्व में भाग लेते हैं।

गीता से कहानी

भगवद् गीता को गीतोपनिषद के नाम से भी जाना जाता है। गीता की कहानी भगवान कृष्ण द्वारा राजपुत्र अर्जुन को दी गई सलाह है। युद्ध के मैदान पर लाखों सैनिकों में सबसे अच्छे तीरंदाज अर्जुन इस समय उलझन में हैं और आश्चर्य करते हैं कि क्या उन्हें अपने दुश्मनों को मारने का अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। संभ्रम एक गंभीर समस्या है कि क्या शत्रु को मारके हिंसा करने का पाप झेल ले, या रिश्तेदारों के जीवन को बचाने के लिये अपने अधिकार को त्याग दें। अर्जुन की चिंताओं पर कृष्ण की प्रतिक्रिया कर्म योग के रहस्यों को समझाना। यदि अर्जुन केवल उसे सौंपे गए कर्तव्यों का पालन करता है, तो एक बहुत कठिन कार्य पूरा करने से उसे इतिहास में सम्मान और गौरव मिलेगा। इसके अलावा, दुनिया अन्याय से मुक्त हो जाएगी और दुनिया फिर से जीवित हो जाएगी। गीता के १८  वें अध्याय में[3] , भगवान कृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि उन्होंने इस युद्ध के लिए और न्याय की जीत के लिए पहले से ही व्यवस्था कर रखी है। उन्होंने अर्जुन को इस युद्ध का नायक चुना है, और भगवान की इच्छा को पूरा करने का अर्जुन एक साधन है।  जब अर्जुन अपने जीवन के उद्देश्य को समझता है कि दुनिया को उसे अपने कर्तव्यों को निभाने की आवश्यकता है, तो वह अपनी चिंताओं को दूर करता है और कठिन कार्य करने के लिए तैयार हो जाता है।

वेदांत के संस्थापक आदि शंकराचार्य की कहानी

वेदांत के संस्थापक आदि शंकराचार्य को माया के सिद्धांत के जनक के रूप में जाना जाता है। उनके बारे में यह कहानी बतायी जाती है। माया के वेदांत सिद्धांत का कहना है कि पूरी दुनिया एक भ्रम है और केवल आत्मन वास्तविक है। तो एक बार कोई आदि शंकराचार्य से पूछता है कि अगर कोई जंगली बैल आप पर हमला करने के लिए दौड़ता चला आये तो आप कैसे प्रतिक्रिया देंगे? आदि शंकराचार्य ने कहा, मैं अपना जीवन बचाने के लिए दूसरी ओर दौड़ लगाऊंगा। जिस पर प्रश्नकर्ता ने कहा, लेकिन सारा संसार माया है, तो आप बैल से क्यों डरते है, वह भी माया है? आदि शंकराचार्य  ने उत्तर दिया कि बैल माया है और मेरा दौड़ना भी माया है; अगर मैं इस शरीर में हूं, तब मुझे भी माया से अपनी रक्षा करने की जरूरत है।

छान्दोग्य उपनिषद से कहानी

अगली कहानी छांदोग्य उपनिषद[4] से आई है, जो नेत्रहीन व्यक्ति का दृष्टांत है। लुटेरों ने इस आदमी को लूट लिया है, उसकी आँखों पे पट्टी बांध के हाथ भी बांध दिये और उसको नेत्रहीन बना दिया। उसे गांधार शहर के बाहर एक जंगल में छोड़ दिया। उसे पता नहीं है कि गांधार शहर में अपने घर परिवार को कैसे वापस लाया जाए। वह असहाय है, आंखों पर पट्टी बांधे और एक जंगल में पड़ा है। इस बिंदु पर, एक बुद्धिमान व्यक्ति, एक आध्यात्मिक गुरु उसे निर्देश देकर उसकी मदद करता है और जब नेत्रहीन व्यक्ति उनका अनुसरण करता है, तो वह अपने घर पहुंचता है और खुश होता है। आदमी समझता है कि भले ही लुटेरों ने उसे लूट लिया हो, उसके साथ बुरा व्यवहार किया हो, लेकिन जो आवाज उसे निर्देशित कर रही है वह एक बुद्धिमान व्यक्ति की आवाज है, जिसे वह अपना गुरु मानता है। वह उस सलाह पर अपना विश्वास रखता है और अपनी मंजिल तक पहुँचता है।

विश्वास किसी को बाधाओं से पार जाने में मदद करता है, जब कोई मानता है कि बेहतर परिणाम संभव हैं। कभी हमें किसी ऐसे व्यक्ति पर विश्वास होता है जिसका हम सम्मान करते हैं, जैसे कि एक गुरु या माता-पिता, या कभी हमें खुद पर विश्वास होता है कि हम बेहतर कर सकते हैं, जब हम प्रयास करें। सकारात्मक परिणामों में विश्वास के साथ नकारात्मकता की बाधाओं को तोड़ा जाता है। यहां आँखों पे पट्टी बांधना ये हमारी गलत धारणाओं, अज्ञानता और जोश का रूपक है, जब कि उस व्यक्ति का घर पहुंचना आत्म-बोध तक पहुंचने का लक्षण है और आत्म-साक्षात्कार की दिशा में यह यात्रा खुशी का परिणाम है।[5]

ग्रीक दार्शनिक, प्लेटो की कहानी

इसी तरह की कहानी ग्रीक दार्शनिक प्लेटो की लिखी हुई किताब गणराज्य (Republic)  में गुफा के रूपक के रूप में जानी जाती है। इस गुफा में रहने वाले लोग जंजीरों में जखडे हुए है, जो इस अवस्था में भी अपनी बाधाओं को दूर करते हैं। जब वे गुफा के बाहर से आने वाले प्रकाश के बल से गुफा से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं, तब पहले आकाश और उस के बाद वास्तविक सूर्य को देखते हैं। वे गुफा से बाहर निकलने में सक्षम होकर अंत में शिक्षित और प्रबुद्ध होते हैं। जब वे गुफा में होते हैं, तो उनके विचार ज्यादातर इस बात से जुड़े होते हैं कि गुफा में लोगों के साथ कैसे चीजें होती हैं, जिन्हें जंजीरों में जकड़े हुए देखा जा सकता है। लेकिन जैसा कि वे अपनी जिज्ञासा पर कार्य करते हैं और यह खोजने की कोशिश करते हैं कि छाया कहां से आ रही है, वे अगले दरवाजे का एक कमरा और आग खोजते हैं, और चारों ओर घूम सकते हैं। जब वे खुद को और अधिक चुनौती देते हैं, तो उन्हें पता चलता है कि गुफा में एक उद्घाटन है और गुफा के मुहाने पर एक प्रकाश है, जो आग की तुलना में अधिक मजबूत है। जब वे बड़ी कठिनाई के साथ गुफा से बाहर निकलते हैं, तो वे पहली बार सूर्य की रोशनी की खोज करते हैं और अंत में जब वे ऊपर देखते हैं, तो वे आकाश में उज्ज्वल सूरज की खोज करते हैं। जब वे ऐसा करने में सफल हो जाते हैं, तो उनकी शिक्षा और ज्ञान पूर्ण हो जाता है।इस दुनिया में सूरज से ज्यादा चमकीला कुछ भी नहीं है। लेकिन वे सूर्य के अस्तित्व के बारे में नहीं जानते होंगे, जबकि एक अंधेरी गुफा में बैठे थे। ये श्रृंखलाएँ रूपक हैं। इसी तरह, हमारी अड़चनें और चिंताएँ ऐसी हैं, जो हमें प्रबुद्ध होने से रोकती हैं। यह केवल तब होता है, जब हम विभिन्न अवसरों की तलाश के लिए खुद को आगे बढ़ाते हैं, तब हम जीवन में नए उपक्रमों के लिए दरवाजे खोलते हैं। दार्शनिकों ने इस धारणा को चुनौती देने की कोशिश की है कि कैसे लोग भविष्य को निराशा के साथ स्वीकार करते हैं, या किसी का पता नहीं लगाते हैं। यह गुफा के लोगों के समान है, जिनके पास भौतिक श्रृंखलाएं हैं और वे नहीं जानते कि कैसे आगे बढ़ना है। उसी तरह हम भी निराशा के कारण अगला कदम कैसे बढ़ाना और अगले स्तर पर जाकर ज्ञान कैसे पाना, यह सोचना बंद कर देते है।

निष्कर्ष

जिस तरह से हम आत्मा में और अपने आप में विश्वास करते हैं, वह हमें अपना दृष्टिकोण बदलने और दुनिया को अलग तरह से देखने में मदद करता है। इस दुनिया की कुछ योजनाएं हैं और जब हम मानते हैं कि हम सभी ब्रह्मतत्त्व के अनुयायी हैं, तो हम अपना ख्याल रखने और कर्तव्यों पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम बनते हैं। यह सभी को बेहतर बनाता है, दूसरों के साथ संबंधों में सुधार करता है और दूसरों के साथ सहानुभूति रखता है। यह आत्मविश्वास बढ़ाता है और चिंता को कम करता है। यह पहचानने से कि तनाव और समस्या जीवन का एक अभिन्न अंग है, आपकी उनके ऊपर नियंत्रण करने की क्षमता बढ़ जाती है। इसलिए, मानसिक और शारीरिक शक्ति बनाए रखने से हम मानसिक बीमारी की शरण में नहीं आते हैं। एक बार जब आप नकारात्मक, चिंतित विचारों पर नियंत्रण कर लेते हैं, तो अच्छे सकारात्मक विचार उत्पन्न होते हैं। सकारात्मक और संतुलित सोच, आपको सही निर्णय लेने में सहायता करती है। यह उत्पादकता को बढ़ाता है, जीवन की बेहतर गुणवत्ता को प्राप्त करता है और यहां तक कि जीवन का आनंद लेने की भावना उत्पन्न होती है, जो कि हमें प्रसन्नता और ज्ञान की ओर लेकर जाती है।

संदर्भ:

  1. A Constructive Survey of the Upanishadic Philosophy, R. D. Ranade, 2002, Bharatiya Vidya Bhavan

https://archive.org/details/A.Constructive.Survey.of.Upanishadic.Philosophy.by.R.D.Ranade.1926.djvu/page/n1/mode/2up

2.           Chhandogya Upanishad https://en.wikipedia.org/wiki/Chandogya_Upanishad

3.           Plato’s Republic, http://classics.mit.edu/Plato/republic.8.vii.html

4.           Brihadaranyaka Upanishad I.4.2, First Adhyaya, Fourth Brahmana, Points 2, 3

https://www.hinduwebsite.com/sacredscripts/hinduism/upanishads/brihad.asp#adh1

5.           Taittiriya Upanishad, Section 7 ‘The Blissful Nature of Brahman’

https://www.hinduwebsite.com/taittiriya-upanishad.asp


[1] Taittiriya Upanishad, Section 7, https://www.hinduwebsite.com/taittiriya-upanishad.asp

[2] Brihadaranyaka Upanishad I.4.2, First Adhyaya, Fourth Brahmana, Points 2 and 3

[3] Bhagavad-Gita, Adhyaya 18, Shlok 67

[4] Chandogya Upanishad, 6.14, Man’s Journey to Self-Knowledge

[5] A Constructive Survey of Upanishadic Philosophy, by R. D. Ranade, 2002, Bharatiya Vidya Bhavan, pages 331-332

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उपनिषदातील भीतीचे निराकरण

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लेखिका: अश्विनी मोकाशी, Ph.D. ©

परिचय

सध्याच्या परिस्थितीत करोना महामारीच्या भीतीमुळे आणि घरात सक्तीने बसावे लागल्याने चिंतेचे विकार वाढत आहेत. लोकांना एकूण जीवनाविषयी चिंता वाटते आणि ते निष्क्रियतेच्या टोकापर्यंत जाऊन काळजी करतात. निष्क्रियतेचे कारण भीती आणि असुरक्षितता आहे; उदाहरणार्थ पुढे काय होईल याची भीती, मृत्यूची किंवा दु: खाची भीती, फायद्याची किंवा तोट्याची भीती, अपयशाची भीती, ताणतणावांची काळजी, इत्यादी. काळजी केल्याने फायदा काहीच होत नाही, परंतु एखाद्या व्यक्तीची उत्पादनशीलतेची पातळी मात्र खाली येते आणि मानसिक शांती नाहीशी होते. चिंता हीच चिंतेचे कारण बनते. मी सध्याच्या साथीतून वाचू शकेन का?  माझे आर्थिक नुकसान भरून निघेल का? या अशा प्रश्नांमुळे आत्मविश्वास ढळू लागतो आणि  कधीकधी असहायतेची जाणीव निर्माण होते. या लेखात आपण चिंता किंवा भीतीची भावना याची कारणमीमांसा करून, त्याचे परीक्षण उत्क्रांतीवाद आणि उपनिषद यांच्या दृष्टिकोनातून करूया आणि या समस्येवर कोणते समाधान मिळते हे पाहण्यासाठी, उपनिषदातील परिच्छेदांचे विश्लेषण करूया.

उत्क्रांतीवादी जीवशास्त्रातील (Evolutionary Biology) भीतीचे विश्लेषण

उत्क्रांतीवादी जीवशास्त्राच्या दृष्टिकोनातून, शिकारी-जमातीतील मानवांना वन्य प्राणी किंवा इतर शिकारी यांच्या हल्ल्यापासून वाचण्यासाठी भीती वाटायची. भीतीमुळे माणूस सतत सावध आणि सतर्क राहतो, जेणेकरून कोणत्याही धोक्यांपासून स्वतःचे रक्षण करणे त्याला शक्य होते. जर जास्त आराम केला किंवा खूप आनंद झाला तर यामुळे माणूस निष्काळजीला बळी पडून  मृत्यूस कारणीभूत ठरू शकायचा. आजच्या काळात जगात खूपच शांततेची परिस्थिती आहे. आता लोकं वन्य पशू आपल्यावर हल्ला करतील याची चिंता न करता शांत झोपतात. जर climate change मुळे काही महापूर आले किंवा साथीच्या आजाराने धुमाकूळ घातला, तर अशाप्रकारची नैसर्गिक आपत्ती किंवा कुठली युद्ध परिस्थिती सोडली तर आपले नेहमीचे आयुष्य नीटनेटके चालू असते. आपल्यातील बहुतेकजण अत्यंत सुसंस्कृत समाजात राहतात, तरीही भीतीची भावना आपल्याबरोबर कायम राहिली आहे. लोक किरकोळ गोष्टींपासून घाबरतात, जसे की त्यांची जीवनशैली, आरोग्य, संपत्ती किंवा तत्सम काही बदल झाले तर त्यांना चिंता वाटते. परंतु त्यांचे अस्तित्व नेहमी धोक्यात येत नाही. असे असून देखील भीती एखाद्याच्या मानसिक स्थितीला अस्वस्थ करून, त्यांना अस्थिर करते. लोक दररोज आपला जीव गमावण्याच्या भीतीने जगत नाहीत, तरीही त्यांच्या चिंता इतक्या खोलवर गेल्या आहेत की त्या लोकांना निष्क्रियतेच्या मार्गावर नेतात. कोणीही आता असे म्हणत नाही, की काय मजा आहे – कोणी पशु किंवा प्राणी इथे माझ्या वाटेला जाणार नाही. परंतु लोकं आपल्या बॉसला एखादा वन्य प्राणी समजून तितकेच घाबरून जातात. 

तैत्तिरिय आणि बृहदारण्यक उपनिषदातील विश्लेषण

उपनिषदांच्या दृष्टिकोनातून बघितले तर, भीती आणि असुरक्षितता स्वतःवर विश्वास नसल्यामुळे उद्भवली आहे. आत्म्यास आणि आत्मशक्तीस न समजल्यामुळे आपण स्वतःवरचा विश्वास गमावून बसतो. आपण स्वतःला विश्वातील लहान कण किंवा अणू किंवा कस्पटासारखे समजतो, ज्याचा काही प्रभाव नाही, ज्याचा कोणाशी किंवा कशाशी संबंध नाही, जो विश्वाचा भाग नाही, जो जगाच्या निर्मितीमध्ये किंवा जगाच्या देखभालीमध्ये भाग घेत नाही, असे आपल्याला वाटते.  तेव्हा अशी व्यक्ती आपल्या अस्तित्वास, आपल्या जीवनास किंवा आपल्या कर्मास जास्त महत्त्व देत नाही. आपण विस्तीर्ण जगाशी कसे बांधलेलो आहोत, हे आपल्या लक्षात येत नाही.  आपल्या कार्यामुळे जगाचे कार्य कसे नियमित चालू राहते आणि जगाच्या प्रभावी कारभारासाठी प्रत्येकाने आपली भूमिका कशी चांगल्या  प्रकारे पार पाडली पाहिजे, याविषयी आपल्याला जाणीव नसते. मग ते  जग म्हणजे आपले कुटुंब असो किंवा आपले कामाचे ठिकाण असो, आपली शाळा किंवा आपला मित्रपरिवार असो, आपण स्वतःला आपल्याच जगाचा हिस्सा मानत नाही. अशा वेळेला एखादा माणूस स्वतःला इतरांपासून दूर, वेगळा ठेवतो. तेव्हा त्याला असा ठाम विश्वास वाटतो की ‘कुणाला आपली काळजी नाही, आपले विचार आणि भावना कुणाला कळत नाहीत आणि या जगात आपल्याला काही किंमत नाही’.

आपण या सृष्टीच्या अस्तित्वापासून वेगळे आहोत या भावनेतून भीती व असुरक्षितता उत्पन्न होते, असे तैत्तिरिय उपनिषदात सांगितले आहे.[1] जर आपण स्वत:ला पूर्णपणे  वेगळे किंवा अद्वितीय मानले, तर  आपण आपल्या अस्तित्वाची व्याख्या, आपल्या इच्छेनुसार आणि आवडी-निवडीनुसार ठरवतो. मग आपण स्वतःला, आपल्या आशाआकांक्षांना, आपल्या वेगळेपणाला इतरांपासून कसे जपावे, याविषयी विचार करण्यास प्रारंभ करतो.  या जगाच्या निर्मितीचा काही उद्देश आहे, यावर आपला विश्वास बसत नाही. हे जग ब्रह्मदेवाची निर्मिती आहे आणि ब्रह्मतत्त्व सर्वत्र अस्तित्वात आहे. स्वत: मध्ये आणि इतरांमध्ये आत्मन म्हणून ते अस्तित्वात आहे, असे जेव्हा आपण मानतो, तेव्हा आपण आपल्या जीवनाचा उद्देश, तसेच या जगाच्या हेतूवर अधिक विश्वास ठेवतो. असे तैत्तिरीय उपनिषदांचे म्हणणे आहे. 

जेव्हा आपण विशिष्टतेच्या भावनेचे समर्थन करतो तेव्हा आपण स्वतःवर, आपल्या इच्छांवर आणि त्या पूर्ण करण्याच्या उद्देशावर आपले लक्ष केंद्रित करतो. इच्छापूर्ती सिद्धांत हा जन्म आणि मृत्यु या पुनर्जन्माच्या चक्राचे कारण आहे. या चक्रात अडकणे हेच एक भीतीदायक चक्र आहे. असा विचार करताना आपण  हे  विसरतो  की आपण ब्रह्माचे एक रूप आहोत, त्याचा एक अंश आहोत.  काही मोठ्या चांगल्या हेतूसाठी आपला जन्म झालेला आहे आणि त्याची पूर्तता करणे हे आपले कर्तव्य आहे. मी एक व्यक्ती म्हणून इतरांपेक्षा वेगळा आहे असा विचार करण्यापेक्षा, मी एक आत्मा असून ब्रह्मतत्त्वाचा एक भाग आहे आणि या ब्रह्मतत्त्वाचा वास्तव प्रत्येकामध्ये आहे – असा विचार करणे श्रेयस्कर ठरेल. आत्म्याचे सर्वांमधील अस्तित्व ही आपल्या सर्वांमधील समानता आहे.

ही समानता आपल्याला इतर कोणत्याही व्यक्तीसारखे बनवते असे नाही. आपली कर्तव्ये, आपले ध्येय, आपली पूर्वकर्मे आणि आपल्या मार्गांनी आपले व्यक्तिमत्त्व बनते. त्यायोगे आपले वेगळेपण दिसून येते. लोकांमध्ये मतभेद आहेत हे नाकारता येत नाही, तथापि आपण सर्वांशी जोडलेले आहोत हे सत्य आहे. उपनिषदांच्या मते आपल्या सर्वांमध्ये निवास करणारे आत्मतत्त्व (individual Self) हे ब्रह्मतत्त्वाचा (universal Self) एक अंश आहे. त्या दृष्टीने आपण समान आहोत.

बृहदारण्यक उपनिषदात एक रूपक कथा आहे.[2] सुरुवातीच्या काळात आत्म्याला एकटेपणाची खूप भीती वाटायची. जेव्हा आत्म्याला समजले की तोच एक सर्वत्र आहे आणि दुसरे कोणी नाही, तेव्हा त्याची भीती नष्ट झाली. नंतर मात्र त्याला एकटे राहून कंटाळा आला, म्हणून त्याने स्वतःचेच दोन भाग केले आणि त्याचे रूपांतर पुरुष आणि स्त्रियांमध्ये झाले. अशा प्रकारे सर्व पुरुष आणि स्त्रिया आत्म्यामध्येच समाविष्ट असतात.

गीतेतील कथा

भगवद्गीतेला गीतोपनिषद म्हणूनही ओळखले जाते. गीतेचे कथानक म्हणजे भगवान श्रीकृष्णांनी राजपुत्र अर्जुनाला दिलेला सल्ला. रणांगणावर असलेल्या लाखो सैनिकांमधील सर्वात धुरंधर धनुर्धारी, सेनापती अर्जुन त्या क्षणी खचून जाऊन गोंधळात पडला आहे आणि आपल्या शत्रूंना ठार मारण्याचे आपले कर्तव्य बजावावे की नाही या संभ्रमात आहे. जीवहानीच्या कृत्यासाठी पाप करावे का शत्रूंकडून अन्याय झालेल्या भावनेने जगावे, लढण्याचे कर्तव्य सोडून आपला राज्यावरचा हक्क सोडावा की आपल्या नातेवाईकांचा जीव वाचवावा, हा संभ्रम ही एक गंभीर समस्या आहे. अर्जुनाच्या चिंतेला श्रीकृष्णांनी दिलेला प्रतिसाद म्हणजे कर्मयोगाची  रहस्ये समजावून सांगणे. जर अर्जुनाने फक्त आपल्यावर सोपवलेली कर्तव्ये व्यवस्थित पार पाडली, तर एक अत्यंत कठीण कार्य पूर्ण केल्यामुळे इतिहासात त्याला सन्मानाची जागा मिळेल आणि सर्वत्र त्याचा गौरव होईल. शिवाय जग अन्यायातून मुक्त होईल आणि जगाचे पुनरुत्थान होईल.  गीतेच्या १८ व्या अध्यायात, [3] भगवान श्रीकृष्णाने अर्जुनाला समजावून सांगितले की त्यांनी या युद्धाची पूर्वसूचना आणि न्याय मिळवून देण्यासाठी आधीच व्यवस्था केली आहे. त्याने अर्जुनाला या युद्धाचा सेनापती म्हणून निवडले आहे आणि अर्जुन हा ईश्वराची इच्छा पूर्ण करण्याचे एक साधन, एक निमित्त आहे. जेव्हा अर्जुनाला आपल्या जीवनाचा हेतू समजतो आणि आपली कर्तव्ये पार पाडण्याची गरज जगाला कशी आहे हे समजते, तेव्हा तो चिंतामुक्त होतो आणि कठीण कार्य करण्यास धजावतो.

वेदांताचे संस्थापक आदि शंकराचाऱ्यांची कथा

वेदांताचे संस्थापक आदि शंकराचार्य यांना मायावादाच्या सिद्धांताचे जनक समजले जाते. त्यांची एक कथा अशी आहे. वेदांतातील मायावादाचा सिद्धांत म्हणतो की संपूर्ण जग हा एक भ्रम आहे आणि फक्त आत्माच वास्तविक सत्य आहे. तर एकदा आदि शंकरांना कोणी विचारलं की, एखादा वन्य बैल तुमच्या अंगावर आला तर तुमची प्रतिक्रिया काय असेल? आदि शंकर म्हणाले, मी दुसऱ्या दिशेने धाव घेईन आणि माझा जीव वाचवेन. तेव्हा प्रश्न विचारणारा म्हणाला, पण संपूर्ण जग जर माया आहे, तर तुम्ही बैलाला का घाबरत आहात? आदि शंकरांनी उत्तर दिले की बैल म्हणजे माया आहे आणि त्याचप्रमाणे माझा जीव वाचवण्याचा प्रयत्नसुद्धा माया आहे. जोपर्यंत मी या शरीरात आहे, तोपर्यंत मला मायापासून स्वतःची काळजी घेणे आवश्यक आहे.

छांदोग्य उपनिषदातील कथा

पुढील कथा छांदोग्य उपनिषदातील आहे.[4] डोळ्यावर पट्टी बांधलेल्या माणसाची ही रूपक कथा आहे. दरोडेखोरांनी या व्यक्तीला लुटले, त्याचे डोळे हात बांधले आणि गंधार शहराबाहेर एका जंगलात त्याला सोडले. गंधार शहरात आपल्या घरी, कुटुंबाकडे कसे परत जायचे याची त्याला काळजी पडली. तो असहाय्य अवस्थेत एका जंगलात अडकलेला आहे. या क्षणी, एक ज्ञानी आध्यात्मिक गुरू त्याला सूचना देऊन मदत करतो. त्या मार्गदर्शनानुसार सूचनांचे पालन करून तो माणूस असहाय्य आणि आंधळा असूनही सुखरूप आपल्या घरी पोहोचतो. तो आणि त्याचे कुटुंबीय आनंदी होतात. त्या माणसाला हे समजले होते की जरी दरोडेखोरांनी त्याला लुटले असेल, त्याला वाईट वागणूक दिली असेल, तरी तो दिशा दर्शविणारा आवाज म्हणजे एखाद्या ज्ञानी माणसाचा आवाज आहे, ज्याला तो आपला गुरु मानतो. तो त्यांच्या सल्ल्यावर विश्वास ठेवतो आणि आपल्या घरी परत जातो. कधीकधी आपला विश्वास एखाद्या आदरणीय व्यक्तीवर असतो, जसे की गुरु किंवा पालक असतील. कधीकधी आपण स्वतःवर विश्वास ठेवतो की आपण अधिक प्रयत्न केला, तर आपण काही चांगले करू शकतो. नकारात्मकतेचे अडथळे ओलांडून सकारात्मक परिणामावर विश्वास ठेवून, नवीन दालने उघडू शकतात. या कथेत पट्टी बांधणे म्हणजे आपल्या चुकीच्या समजुती, अज्ञान आणि आकांक्षा यांचे रूपक आहे, तर घरी पोहोचणे म्हणजे आत्म-प्राप्तीपर्यंत पोहोचण्याचे लक्षण आहे. आत्म-प्राप्तीकडे जाण्याचा हा प्रवास आनंदात परिपूर्ण होतो.[5]

ग्रीक तत्वज्ञ प्लेटोच्या वाङ्मयातील कथा

अशीच एक कथा ग्रीक तत्वज्ञ प्लेटोच्या वाङ्मयातील प्रजासत्ताक (Republic) या ग्रंथात आढळते, जी गुहेचे रूपक म्हणून ओळखली जाते.[6] एका गुहेत साखळदंडांनी बांधलेले लोकं रहात असतात, जे अशा स्थितीत देखील त्यांच्या अडथळ्यांना पार करतात. प्रथम त्यांना शेजारच्या खोलीतून येणाऱ्या अग्नीच्या प्रकाशामुळे निर्माण झालेल्या सावल्या दिसतात. तेव्हा ते मान वळवून बघतात, तर त्यांना अग्नी दिसतो. अग्नीच्या दिशेने जाताना त्यांना गुहेच्या बाहेरून येणारा प्रकाश दिसतो. त्या प्रकाशाच्या बळावरुन जेव्हा ते गुहेतून बाहेर पडण्याचा प्रयत्न करतात, तेव्हा त्यांना आकाशात तळपणारा सूर्य दिसतो. त्याक्षणी त्यांना तेजाचा अनुभव येतो, कारण सूर्याशिवाय जास्त तेजःपुंज काही असूच शकत नाही.

गुहेत असताना आणि साखळदंडात जखडलेले असताना त्यांचे विचार मुख्यत: समोर दिसणाऱ्या सावल्यांशी निगडीत असतात. परंतु जेंव्हा ते कुतूहलाने सावल्या कोठून येत आहेत हे शोधण्याचा प्रयत्न करतात, तेव्हा त्यांना शेजारीच अजून एक खोली आणि खोलीत तप्त असलेला अग्नी दिसतो. ते स्वत: ला आव्हान देतात तेव्हा त्यांना कळते की गुहेला एक प्रवेशद्वार आहे आणि तिथे प्रकाश आहे, जो त्या गुहेतल्या अग्नीपेक्षा अधिक शक्तिशाली आहे. ते मोठ्या प्रयत्नाने गुहेतून बाहेर पडतात आणि त्यांना प्रथमच सूर्यप्रकाशाचे दर्शन होते. नंतर त्यांनी आकाशात वर पाहिल्यावर त्यांना आकाशातील तेजस्वी सूर्याचे दर्शन होते. त्या क्षणी त्यांचे शिक्षण आणि ज्ञान पूर्ण होते. सूर्यापेक्षा तेजःपुंज  काहीही नाही. परंतु त्यांना गडद गुहेत साखळदंडात बसून असलेल्या अवस्थेत सूर्याच्या अस्तित्वाविषयी माहिती नसते. या साखळ्या रूपकात्मक आहेत. त्याचप्रकारे आपल्या अडचणी व चिंता अशा आहेत की त्या आपल्याला ज्ञानी होण्यापासून वंचित करतात. आपण स्वत: ला वेगवेगळ्या संधी शोधण्यासाठी उद्युक्त करतो, तेव्हा आपण जीवनात नवीन उपक्रमांचा श्रीगणेशा करतो. निराशेने आपण ग्रासलेले असतो, तेव्हा आपणही गुहेतल्या लोकांसारखे हताश झालेले असतो, ज्यांना पुढच्या खोलीत कसे जायचे किंवा जीवनातले पुढचे पाऊल कसे उचलायचे हे माहीत नसते.

निष्कर्ष

आत्म्यावर आणि त्यायोगे स्वतःवर विश्वास ठेवण्याचा मार्ग आपली मनोवृत्ती बदलण्यास आणि जगाकडे काही वेगळ्या दृष्टीने पाहण्यास मदत करतो.  या जगाची काही योजना आहे आणि आपण सर्व ब्रह्मतत्त्वाचे पालनकर्ते आहोत असा जेव्हा आपला विश्वास असेल, तेव्हा आपण स्वतःची काळजी घेण्यास आणि कर्तव्यावर लक्ष केंद्रित करण्यास सक्षम बनतो. त्यामुळे सर्वांची उन्नती होते, इतरांशी संबंध सुधारतात आणि इतरांबद्दल सहानुभूती वाटते. यामुळे आत्मविश्वास वाढतो आणि चिंता कमी होते. ताणतणाव आणि काळज्या हा जीवनातील अविभाज्य भाग आहे हे स्वीकारून त्यांच्याशी चार हात करण्याची आपली क्षमता  वाढते. त्यामुळे मानसिक आणि शारिरीक सामर्थ्य कायम राखल्याने आपण मानसिक आजारांना बळी पडत नाही. एकदा नकारात्मक, चिंताग्रस्त विचारांवर विजय मिळविल्यानंतर चांगले सकारात्मक विचार निर्माण होऊ शकतात. सकारात्मक आणि संतुलित विचारांनी, निष्क्रियता किंवा अतिउत्साह या दोन्हींमधील फरक समजून योग्य निर्णय घेण्यास मदत होते. त्यामुळे उत्पादकता वाढते, चांगल्या दर्जाची जीवनशैली प्राप्त होते आणि जीवनाचा आस्वाद घेऊन ज्ञानप्राप्तीकडे सुखाची वाटचाल सुरु होते.

संदर्भ:

  1. A Constructive Survey of the Upanishadic Philosophy, R. D. Ranade, 2002, Bharatiya Vidya Bhavan https://archive.org/details/A.Constructive.Survey.of.Upanishadic.Philosophy.by.R.D.Ranade.1926.djvu/page/n1/mode/2up
  2. Chhandogya Upanishad https://en.wikipedia.org/wiki/Chandogya_Upanishad
  3. Plato’s Republic, http://classics.mit.edu/Plato/republic.8.vii.html
  4. [1] Brihadaranyaka Upanishad I.4.2, First Adhyaya, Fourth Brahmana, Points 2 and 3 https://www.hinduwebsite.com/sacredscripts/hinduism/upanishads/brihad.asp#adh1
  5. Taittiriya Upanishad, Section 7 ‘The Blissful Nature of Brahman’ https://www.hinduwebsite.com/taittiriya-upanishad.asp

Footnotes:

[1] Taittiriya Upanishad, Section 7, https://www.hinduwebsite.com/taittiriya-upanishad.asp

[2] Brihadaranyaka Upanishad I.4.2, First Adhyaya, Fourth Brahmana, Points 2 and 3

[3] Bhagavad-Gita, Adhyaya 18, Shlok 67

[4] Chandogya Upanishad, 6.14, Man’s Journey to Self-Knowledge

[5] A Constructive Survey of Upanishadic Philosophy, by R. D. Ranade, 2002, Bharatiya Vidya Bhavan, pages 331-332

[6] Plato’s Republic, book VII

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आनंदाची मोजपट्टी 

लेखिका: अश्विनी मोकाशी ©

प्रत्येक वर्षी 20 मार्च रोजी ‘आंतरराष्ट्रीय आनंद दिन’ साजरा केला जातो. कोरोनाव्हायरस, कर्फ्यू आणि सामाजिक अंतर, घरातून नोकरी करणे किंवा घरून शाळा शिकणे, अशा सद्य परिस्थितीत आनंदी राहणे फारच अनाकलनीय आणि अशक्य कोटीतील गोष्ट वाटत आहे. परंतु कदाचित ही समस्या आपल्याला काही प्रमाणात सोडवता येईल. आपल्याला भगवद्गीतेतील आणि स्टोइझीझममध्ये सांगितलेली आनंदाची संकल्पना माहित असेल, तर आपल्याला या परिस्थितीतदेखील स्वतःला संतुलित, समतोल आणि त्यानुसार आनंदी कसे ठेवता येईल, याचे समाधान मिळेल. या समस्येचे समाधान आणि उत्तर आपण आनंद कसा मोजतो, त्यासाठी कोणता कस लावतो आणि कुठली मोजपट्टी वापरतो, यामध्ये सामावलेले आहे.

आनंद कसा मोजावा

आपण वारंवार हा शब्दप्रयोग वापरतो की आपल्याला आज कसे वाटत आहे, आपण आज खूष आहोत की नाखूष आहोत.  भागवद्गीतेत सांगितलेल्या किंवा स्टोईक तत्त्वज्ञांनी ठरवलेल्या अटी जर आपण विचारात घेतल्या आणि त्यांनी मांडलेले आनंदाचे निकष आपण मानले तर, आपल्याला त्याची मोजपट्टी (scale) खालीलप्रमाणे दिसेल.  या मोजमापात १ म्हणजे कमीतकमी आनंदी आणि ५ म्हणजे सर्वात आनंदी, असे समजावे:

1. प्रचंड नाखूष
2. काहीसे नाखूष
3. संतुलित
4. काहीसे आनंदी
5. प्रचंड आनंदी 

‘प्रचंड नाखूष’ असण्याची पहिली अवस्था म्हणजे दुःखाने ग्रस्त असणे. उदाहरणार्थ, एखाद्या प्रिय व्यक्तीला गमावणे किंवा दिवाळखोरी येणे, अशा मोठ्याप्रमाणात झालेल्या नुकसानाचा सामना करावा लागल्याने भावनिक ओझे सहन न होणे, आणि परिणामी कार्य करण्यास सक्षम नसणे आणि निष्क्रिय होणे. 

‘काहीसे नाखूष’ होण्याची दुसरी अवस्था म्हणजे चिडचिडेपणा, रागावणे, एखाद्याशी भांडणतंटा झाल्याने किंवा एखादी गोष्ट बिघडल्याने आनंदी न होण्याची स्थिती होय. काही उदाहरणे अशी असतील की आपला फोन किंवा काही सॉफ्टवेअर खराब झाले आहे, किंवा कामावर खराब अभिप्राय मिळत आहे किंवा कुणीतरी सतत टीका करत आहे.

‘संतुलित’ होण्याची तिसरी अवस्था म्हणजे आपल्या कामावर लक्ष केंद्रित करून आपली रोजची कामे करत राहणे आणि आपल्या  कामात कुठलाही अडथळा न आणता, आपले कर्तव्य पार पाडण्याची स्थिती.

‘काहीसे आनंदी’ होण्याची चौथी अवस्था म्हणजे एखाद्या घटनेबद्दल उत्सुक असणे, एखाद्याला पाहण्याची उत्सुकतेने वाट पाहणे, एखाद्या फायद्याच्या बातमीची अपेक्षा करणे, आणि चांगल्या मनःस्थितीत असण्याची स्थिती.

‘प्रचंड आनंदी’ असण्याची पाचवी अवस्था क्वचित अनुभवास येते. उदाहरणार्थ आपल्या बाळाचा जन्म, प्रथम मिळालेली नोकरी, प्रेमात पडणे आणि प्रेमाला प्रतिसाद मिळणे,  बेरोजगार असताना मोठी लॉटरी लागणे. अशी आनंदाची स्थिती आयुष्यात काही वेळेलाच अनुभवास येते. 

आपली आनंदाची व्याख्या

जेव्हा आपण म्हणतो की आज आपण इतके आनंदी नाही, तेव्हा आपण मुळात स्वतःला असे म्हणत असतो की आनंदी असणे म्हणजे काय, याची माझ्याकडे एक व्याख्या आहे आणि ती व्याख्या माझ्या सद्य परिस्थितीत किंवा माझ्या सध्याच्या मनाच्या स्थितीनुसार जुळत नाही. म्हणून, मी आनंदी नाही. हा निष्कर्ष एखाद्याला अजून जास्त दु: खी करतो. तर, आनंदी असण्याची आपली व्याख्या काय आहे, आपण वरील अनुक्रमानुसार कुठल्या स्थानावर असायला हवे – म्हणजे तिसऱ्या, चौथ्या की पाचव्या स्थानावर असावे, याचा विचार करतो.  आपली सध्याची मानसिक स्थिती आणि आपल्या आनंदाची व्याख्या का जुळत नाही, याची अनेक कारणे असू शकतात. कदाचित आपण चांगल्या बातमीची अपेक्षा करत असू, पण ती लवकर मिळत नाहीये. कदाचित आपली अपेक्षा असेल की ही वाईट परिस्थिती लवकर निघून जाईल, पण तसे होत नाहीये. कदाचित आपली चिडचिड होत असेल आणि ती चिडचिड आपोआप नाहीशी होत नाहीये. तर्कशुद्ध पद्धतीने बघितल्यास आपल्याला उत्तर मिळेल की, आपली मानसिक स्थिती आणि आपली सद्य परिस्थिती एकमेकांस संलग्न करणे किंवा आपली आनंदाची व्याख्या बदलणे. उदाहरणार्थ, आपल्याला कोणत्या पातळीवरील आनंद पाहिजे, याची व्याख्या आपण बदलू शकतो किंवा आपली सध्याची मानसिक स्थिती ठीक आहे, असे समजू शकतो. गीतेत सांगितलेली आनंदाची स्थिती ही मनाची स्थिर स्थिती म्हणून ओळखली जाते. अशा स्थितीत सुखदुःख किंवा नफा-तोटा दोन्ही समान असते. अशा व्यक्तीला दुःख पचवायची किंवा सुखात वाहून न जाण्याची गुरुकिल्ली सापडलेली असते. त्यांची आनंदाची स्थिती आणि अनुभूती, प्रासंगिक बदल सोडल्यास, चिरकाल टिकणारी असते. 

आता गीता आणि स्टोइक तत्त्वज्ञ यांची दोघांची व्याख्या एकच आहे. सुखी माणूस हा संतुलित मनःस्थितीत, आपल्या मोजपट्टीप्रमाणे # ३ च्या स्थानावर असतो. जर आपण वेळोवेळी  # १ किंवा # ५ वर असाल तर आपण स्थिर नाही. त्याची करणे वेगळी असू शकतील, उदाहरणार्थ काही तोट्यामुळे किंवा कुणाला गमावल्यामुळे आपण दु: खी आहोत किंवा काही लॉटरी जिंकल्याबद्दल आपण आनंदाच्या शिखरावर आहोत. या घटना आपल्या आयुष्यात क्वचित घडतात. कधीकधी त्या अगदी कमी कालावधीत देखील घडू शकतात, परंतु जर शंभर वर्षांचे आयुष्य मोजले आणि एखाद्याच्या जीवनातील मोठे नुकसान किंवा त्याचे मोठे फायदे पाहिले, तर सांख्यिक दृष्टिकोनातून या अशा मोठ्या घटना दररोज, दरमहा किंवा प्रत्येक वर्षीपण होत नाहीत. उदाहरण द्यायचे झाले तर, आपल्या आयुष्यात फक्त दोनदा आपले आईवडील आपण गमावतो किंवा एखाद्याला दोन मुलं आहेत असे मानले, तर मुलांच्या जन्माचा होणार आनंदपण दोन वेळेलाच होतो. म्हणूनच प्रचंड आनंद किंवा प्रचंड दुःख झाले, तर ते शंभर वर्षाच्या कालावधीत केवळ दोनदोन वेळाच होईल. शिवाय मृत्यू अटळ आहे, या न्यायाने ते दुःख सहन करण्याची ताकद मिळते. त्याप्रमाणेच लक्ष्मी चंचल असते, म्हणून पैसे येणे किंवा जाणे हे अपरिहार्य आहे, म्हणून आपण आश्चर्यचकित होत नाही.

सद्यस्थितीत सामाजिक अंतर राखून, घरी राहून काम करून, जर आपण आपले दैनंदिन जीवन चालू ठेवण्याचे धैर्य वाढवू शकलो, आणि वाईट बातमी अपरिहार्य समजून सुरक्षित राहिल्याबद्दल कृतज्ञता बाळगू शकलो, तर हे संतुलित राहण्याचे लक्षण आहे आणि त्यात आनंद आहे. हा विचार आपल्या आयुष्यात समाधानी राहण्यास मदत करेल आणि परिस्थितीवर मात करायला मदत करेल. 

काळजी घ्या आणि संतुलित रहा!

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Measuring Happiness

By Ashwini Mokashi ©

Today is the International Day of Happiness, celebrated each year on March 20th. In the current circumstances of the fear of coronavirus, curfews and social distancing, working or schooling from home – being happy seems like a far-stretch. But perhaps it will help, if we know the idea of Happiness, as seen in the Gita and the Stoicism, how we can still try to keep ourselves balanced, equanimous and therefore happy in these circumstances. The answer lies in how we measure happiness.

So how do we measure happiness? We frequently talk about how we are feeling, whether we are feeling good or not so good, happy or unhappy. So, if we were to chart a criteria of Happiness, that will meet the conditions set by the Bhagavad-Gita or the Stoics, they would look like this, with 1 being least happy and 5 being most happy:

  1. Seriously Unhappy
  2. Somewhat Unhappy
  3. Balanced
  4. Somewhat Happy
  5. Super Happy

The first state of being ‘seriously unhappy’ would refer to being grief-stricken, suffering a major loss like losing a loved one or losing one’s financial support, resulting into not being able to function and be close to inaction as a result of too much emotional burden.

The second state of being ‘somewhat unhappy’ would refer to the state of being irritated, annoyed, not being happy with someone or something. Some examples would be like the phone is not working, or some software is malfunctioning, or getting a bad feedback at work, or feeling criticized.

The third state of being ‘balanced’ would refer to our day-to-day state of focusing on our duties, on our work without being perturbed by any distractions.

The fourth state of being ‘Somewhat Happy’ would refer to being excited about some event, looking forward to seeing someone, expecting a news of a benefit, just feeling chipper.

The fifth state of being ‘Super Happy’ would refer to the kind of joy that one feels only once in a blue moon, like the birth of a baby, getting the first job, falling in love and being reciprocated, winning a million dollar lottery while being unemployed.

Definition of being Happy

When we say we do not feel so happy today, we are basically saying to ourselves that I have a definition of what it means to be happy and that definition is not being matched by my current circumstances or by my current state of mind. Hence, I am not happy. The conclusion makes one even more unhappy.

So, what is our definition of being happy? Maybe we are expecting some good news and that is not coming soon enough. Maybe we are expecting some bad situation to go away, and that is not happening soon enough. Maybe we are irritated, and the irritation is not magically disappearing. There can be several reasons, why there is a mismatch between our current mental state and our definition of happiness.

So, the logical solution would be to bring our mental state and our situation to align themselves, or to change our definition of where we want to be now. For example, we can change our definition of what level of happiness we want, or we can look at our current mental state as fine. The Bhagavad-Gita aims at the state of happiness, which is known as a stable state of mind, equanimous to gains and losses, pleasure and pain.

Now the Gita, like the Stoics aims at # 3 for their definition of a happy person. If we are at # 1 or # 5, then we are not stable. Whether we are grief-stricken due to some loss, or whether we are excited about having won some lottery. These events happen once in a blue moon in our lives. Sometimes they can happen in a shorter period of time, but the point is if you measure life of a hundred years and you look at your major losses or major gains in one’s life, statistically they do not happen every day, every month, or every year. Like for example, we lose our parents only twice in our lives. Or we have kids on average only twice in our lives. So the major gains or losses, if we see them as the birth of one’s kids or loss of both our parents would only happen two times over a hundred year period. Not to mention, losses are inevitable, so they do not come as surprises.

In the current times of staying home or working from home due to social distancing, if we could muster our courage to keep our daily life going, be equanimous to the bad news and be grateful for being safe, it is still a sign of being balanced and being happy. That thought will help us stay content with our lives.

Keep Well and Stay Balanced!

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Upanishadic Antidote to Anxiety

By Ashwini Mokashi ©

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Introduction

Anxiety disorders are on the rise. People suffer from generalized anxiety about life and they worry to the point of inaction. At the root of inaction lies fear and insecurity, fear of the unknown, fear of death or suffering, fear of gain or loss, fear of failure. Worrying does not help the cause, instead it brings down the level of productivity for a person. The anxiety itself is a cause of concern. Would I survive the current pandemic? Will I be able to recover the financial losses, presuming I survive? Questions of this kind start the process of self-doubt and sometimes lead to learned helplessness.

Let us examine the causes for this feeling of anxiety or emotion of fear both from the evolutionary biology and Upanishadic points of view and analyze the passages in the Upanishads to see what light they throw on this problem.

Analysis of Fear from the Evolutionary Biology

From the point of view of evolutionary biology, human beings in the hunter-gatherer community needed to be afraid to survive an attack from wild animals or other fellow hunter-gatherers. It helped to be in an alert state of mind, so that they could protect themselves from any dangers. If they relaxed too much or got very happy, that could cause their demise. The world is now at a far more peaceful state, than it has ever been before. People sleep peacefully without worrying about a wild boar attack. They carry out their routine as normal, unless they are in a war zone or in a natural calamity, such as floods caused by climate change or the current pandemic caused by a new virus. Most of us currently live in a very civilized society, yet the instinct of fear has stayed with us. People are afraid of minor things, such as their lifestyle, status, health, wealth, or such, but their survival is not always at stake. It most certainly affects one’s mental state and makes us unstable. People are not living in fear of losing their life daily, and yet their anxieties are so deep that they can paralyze people to inaction. One does not say to oneself anymore, oh what a relief – there is no wild animal charging towards me, it is just my boss coming towards me. One imagines the boss as the same kind of danger as the wild animal, and one panics.

Analysis from the Taittiriya and Brihadaranyaka Upanishad

From the Upanishadic point of view, fear and insecurity are caused by lack of trust in oneself, which in turn is caused by not understanding oneself or one’s Self (Atman). When one thinks of oneself as a small particle (like an atom or anu in Sanskrit) in the universe, which has no influence, which is not linked to anyone or anything, which is not a part of the universe, which does not participate in the global creation or continuation, then one does not give much importance to one’s existence, or one’s purpose of life, or one’s Karma. If one does not understand how one is linked with the wider world and happens to be also ignorant about how the world functions due to these connections and how each one of us needs to play one’s part right for the effective functioning of the unit one is in, whether it is one’s family, one’s workplace, school or social network, one ends up isolating oneself. One thinks of oneself as inconsequential, leading to a belief that ‘we do not matter, our thoughts and feelings do not matter, and no one cares for us’.

According to the Taittiriya Upanishad[1], fear and insecurity are born out of this feeling that we are distinct from the rest of the creation. If we think of ourselves as completely unique and we define our existence by our desires and likes and dislikes, then we start thinking of how to protect ourselves, our differences from the others. We do not trust in the creation of this world with a purpose. When we believe that this world is a creation of Brahman and that Brahman exists everywhere, in myself and in others as Atman, then we tend to trust more and believe in the purpose of one’s life as well as the purpose of this world.

When we nurture the feeling of uniqueness, we focus on ourselves, our desires and how to fulfil them. The desire-fulfilment theory leads to cycles of births and rebirths, which itself becomes a fearful proposition. We do not see ourselves as the agents of Brahman who are fulfilling a purpose for the greater good, but as agents who are uniquely designed to do whatever we want to do. Then we see ourselves not as Atman, that resides in everyone, but as me as an individual, who is different from the others.

The similarity among all Selves does not necessarily make us the same as any other person. We carry our individualities with our karma, our destinies, our goals and our paths. There is no denying about differences among human beings, nonetheless what binds us together is the fact that we all have a Self that relates to the Universal Self. In that respect, we are similar.

Brihadaranyaka Upanishad[2] gives us a story of how in the beginning, Self was one and when the Self realized that it is one and there is no other, then it lost all the sense of fear. Later it got bored by itself, so it evolved into men and women from the same substance. Hence, all men and women partake in the Self.  

Story from the Gita

Bhagavad-Gita, which is also known as Gitopanishad is the advice given to the most brilliant archer, Prince Arjuna, who is sitting in the battlefield, being confused and facing a dilemma of whether to do his duty as a warrior to kill his enemies and incur sin for the act of killing; or whether to give up fighting, forsake his kingdom and live with a sense of injustice at the hands of his enemies, who are also his relatives. This is a serious issue and thankfully he is accompanied by Lord Krishna, who enlightens him. The Gita’s response to the anxiety of Arjuna was to explain to him the secrets of Karma-yoga. If he just continued to do his duties that are assigned to him and carry them out diligently, he would be considered a hero for having fulfilled a very difficult task and earn his seat of honor in history, and the world would be better off for his actions in carrying out a war against injustice. In the 18th chapter of the Gita, Lord Krishna explains to Arjuna that he is the Godhead and he has already arranged for this war to take place and for the justice to prevail.[3] He has chosen Arjuna to be the hero of this war, and Arjuna is just a means to carry out God’s will. When Arjuna sees the purpose of his role and sees how the world is going to require him to carry out his duties, he sheds his anxieties and gets ready to do the difficult task.

Story of Adi Shankara, Founder of Vedanta

There is a story attributed to the founder of Vedanta, Adi Shankara Acharya, as a critique of his theory of Maya. The Vedanta theory of Maya says that the whole world is an illusion and Atman (Self) alone is real. So once someone asks Adi Shankara, how would you react if a wild bull comes charging at you? Adi Shankara said, I would run for my life. To which the questioner said, but the whole world is Maya, so why are you afraid of the bull, who is also Maya? Adi Shankara replied that the bull is Maya and so is my running Maya; but if I am in this body, I still need to take care of myself from Maya.

Story from the Chhandogya Upanishad

The next story comes from the Chhandogya Upanishad[4], which is a parable of the blindfolded man. The robbers have robbed this man, blindfolded him and left him outside the city of Gandhara in a forest. He has no idea how to get back to his house and his family in the city of Gandhara. He is helpless, blindfolded and in a forest. At this point, a wise man, a spiritual guru helps him by giving him instructions and when the blindfolded man follows them, he reaches his home and is happy. The man understands that even if the robbers had robbed him, ill-treated him, the voice that is guiding him is the voice of a wise person, whom he considers his guru. He places his faith in that advice and reaches his destination.

Faith helps one get over barriers, when one believes that better outcomes are possible. Sometimes we have faith in someone we respect, such as a guru or a parental figure, or sometimes we have faith in ourselves that we can do better, provided we try hard enough. The barriers of negativity can be broken with trust in positive outcomes, greater possibilities and greener pastures. Here the blindfold represents our misconceptions, ignorance and passions, while reaching home represents reaching self-realization and this journey towards self-realization results into happiness.[5]

Story from the Greek Philosopher, Plato

A similar story is found in Plato’s Republic[6] known as the allegory of the cave. It talks about chained people in the cave, who overcome their barriers, when they try to step out of the cave by the force of light that is coming from outside the cave and finally are educated and enlightened, when they see the actual sun in the sky after they are able to step out of the cave. While they are in the cave and in a state of being chained, their thoughts about the situation on the ground are mostly connected with acceptance about how things are in the cave with people in a state of being chained watching only the shadows in front of them. But as they act on their curiosity and try to find where the shadows are coming from, they discover a room next door with a fire and people, who can walk around. When they challenge themselves further, they discover that the cave has an opening and there is a light at the mouth of the cave, which is stronger than the fire in the cave.

When they step out of the cave with great difficulty, they discover the sunlight for the first time and finally when they look up, they discover the bright sun in the sky. When they succeed in doing that, their education and enlightenment is complete. There is nothing brighter than the sun in this world. But they wouldn’t have known about the existence of the sun, while sitting in a dark cave being chained. These chains are metaphorical. Likewise, our constraints and anxieties are such, that they prevent us from being enlightened. It is only when we push ourselves to look for different opportunities, then we open doors for new ventures in life. Philosophers have tried to challenge the notion of how people accept life with no future, out of frustration or not knowing how to find one’s way out. It is very similar to the people in the cave, who have physical chains and do not know how to proceed to the next room, next level of enlightenment.

Conclusion

The path of trust in one’s Self helps us change our attitude, look at the world somewhat differently. When one trusts that there is a plan for this world, and we are all agents of the Brahman, it enables one to take care of oneself and focus on one’s duties to let the world function better. When one understands that one is a Self, which is the same in every other individual, connection with others and compassion for others becomes natural. This creates more confidence and less anxiety.

Once one has overcome negative, anxious thoughts, it allows one’s brain to produce good positive thoughts and see the light at the end of the tunnel. When one can cross these barriers, it takes one to a new realm of a possibility, resulting in productivity, better quality of life and even a sense of enjoying life for what it is worth, leading one towards Happiness and Enlightenment.

References:

  1. A Constructive Survey of the Upanishadic Philosophy, R. D. Ranade, 2002, Bharatiya Vidya Bhavan https://archive.org/details/A.Constructive.Survey.of.Upanishadic.Philosophy.by.R.D.Ranade.1926.djvu/page/n1/mode/2up
  2. Chhandogya Upanishad https://en.wikipedia.org/wiki/Chandogya_Upanishad
  3. Plato’s Republic, http://classics.mit.edu/Plato/republic.8.vii.html
  4. Taittiriya Upanishad, Section 7 ‘The Blissful Nature of Brahman’ https://www.hinduwebsite.com/taittiriya-upanishad.asp
  5. Brihadaranyaka Upanishad I.4.2, First Adhyaya, Fourth Brahmana, Points 2 and 3

[1] Taittiriya Upanishad, Section 7, https://www.hinduwebsite.com/taittiriya-upanishad.asp

[2] Brihadaranyaka Upanishad I.4.2, First Adhyaya, Fourth Brahmana, Points 2 and 3 https://www.hinduwebsite.com/sacredscripts/hinduism/upanishads/brihad.asp#adh1

[3] Bhagavad-Gita, Adhyaya 18, Shlok 67

[4] Chandogya Upanishad, 6.14, Man’s Journey to Self-Knowledge

[5] A Constructive Survey of Upanishadic Philosophy, by R. D. Ranade, 2002, Bharatiya Vidya Bhavan, pages 331-332

[6] Plato’s Republic, book VII

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Platonic Idealism Reflected in Stoicism

By Ashwini Mokashi, Ph.D.

In this article, I would like to discuss the idea of the wise person in Stoicism, with a focus on Seneca’s writings and the origin of the concept in Plato’s writings. The article will discuss (a) who is a Sapiens, (b) the process of becoming a Sapiens and (c) philosophical critique of this concept. At each stage, the article shows the connection to Plato and Platonic tradition. The critique of the concept also evaluates pitfalls of the concept of the wise person and the pitfalls of Stoic attachment with Platonic idealism, which suffers similar setbacks.

  • Who is a Sapiens

The concept of a wise person, also known as Sapiens in Latin or ‘ho sophos’ in Greek first entered Graeco-Roman culture when the Delphic Oracle declared Socrates to be the wisest man of all. Although Socrates tried his best to refute that statement by pointing to weaknesses and lapses in his own life, the sobriquet never left him and he came to symbolize the ideal of life in that society. His influence was so great that even a century after his death, Zeno of Citium was found recommending the ideals of Socrates as standards of life for everyone. The life of a sapiens and that of Socrates became interchangeable terms. Every citizen was urged to be like Socrates. Hence it became important to arrange the Socratic values into a system to serve as a design for training and guidance. Zeno codified these norms and other Stoics including Seneca followed suit.

  • The process of Becoming a Sapiens

Comprehending the Sapiens as an embodiment of Stoic ethics entails understanding Stoic ethical notions. Stoic scholars listed them separately, commented upon them individually and made some attempts at defining them. Some of the common features of the ethics include the concepts of kathekonta (appropriate actions), oikeiosis (what belongs to oneself), eudaimonia (happy life), arête (virtue) and the Sapiens (wise person), in whom all the ethical terms find their apotheosis. Stoic dialectics plays a key role in understanding how the wise person acquires the expertise to match different situations with suitable arguments, to resist his impulsive responses, and to give his assent to the right judgment. The Stoic theory of indifferents, divided between preferable and less preferable indifferents, sheds some light on the essential and inherent sense of detachment or apatheia in the Sapiens. The telos of a human life, living in accordance with nature, contributes to virtue and wisdom and thereby leads to happiness.

  • Philosophical Critique of this Concept

Stoic theories seem to fall in the same trap, as does Plato’s idealism including his theory of Ideas. Stoics take inspiration from Platonic philosophy. They ape his philosophical positions and are open to similar charges as Platonic philosophy. Stoic or Platonic theories are idealistic and attractive, but neither pragmatic nor detail oriented. As a result, it enables their critiques to call in question their holistic understanding without showing inconsistencies in their detailed footwork. The charges of creating a utopian concept of a wise person or supporting the elitist culture throughout their philosophies are aimed at the root of Stoic agenda of virtue.

Society upheld Plato’s dialogue ‘Apology’ as a good defense of Socrates’s viewpoint, after Socrates paid the price for his philosophical perspectives with his life. Seneca certainly gained a good following in the later literature, probably because of his unfair death at the hands of Nero or because of being one of the few Stoic writers, whose original writing had survived through the ages. Nevertheless, looking at the philosophical conception of Seneca’s Sapiens, one can derive certain similarities in the fate of this theory with that of Platonic theory of Ideas. Both the theories make an attempt to grapple with some colossal issues of human understanding, namely how to attain human perfection or how to understand reality. They come very close to having solutions. But in the attempt to have perfect solutions, both create utopian structure – Seneca by creating a perfect wise person and Plato by creating an idea of the essence of an object. Nonetheless, neither Plato nor Seneca see this charge as fatal and here is why. It is important to understand a philosophical position in its own conceptual make-up. Given the ideological background of both philosophies, it is a little wonder that they understood the world in terms of perfection. If Aristotle had flourished prior to Plato, Plato would have been able to refute his theories. What is significant for Stoics is that they offer a perfect package of an ideal human being to the world and let everyone strive for perfection, so that the world will be a better place. The only way to make it possible was to create a theory, which was faultless.

Kurt Goedel proved that no mathematical system is both complete and consistent. The same principle would apply to a philosophical theory as well. Both Platonic theory of ideas and Seneca’s Sapiens are beautifully designed ‘consistent’ theories, but whether they are complete or not, depends on how well we can interpret them and learn to apply those principles in our lives.

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Wisdom Leads to Happiness

Evergreen Forum Course, February 2020 – Reading and Viewing Material:

LECTURE PLAN:

  1. Introduction to the Indian Philosophy and the Gita
  2. The Concept of Sthitaprajna
  3. Introduction to Stoic Seneca
  4. The Concept of the Sapiens
  5. Strategies for Emotional Control in both Philosophies
  6. Wisdom Vs Non-wisdom in Seneca and the Gita
  7. Comparison of Sapiens and Sthitaprajna
  8. Happiness, Sukha, Shanti, Eudaimonia

Books Recommended for Further Reading:

  1. Sapiens and Sthitaprajna by Ashwini Mokashi – Useful for all Lectures
  2. De Vita Beata by Seneca (Available on Amazon, or in the local libraries, certainly at the Firestone library at the University) – Useful for Lecture 8
  3. Seneca’s Letters – Useful for Lectures 3, 4 and 8
  4. https://hillelettersfromstoic.files.wordpress.com/2014/10/letters-from-a-stoic_lucius-annaeus-seneca.pdf, other pdfs available on the internet too.
  5. Moral Essays by Seneca (Available on Amazon, or in the local libraries, certainly at the Firestone library at the University) – Useful for Lectures 5, 6, 7
  6. Bhagavad-Gita, Translation of the 1st, 2nd and 3rd chapters – you are welcome to read all the chapters. (There are many good books available on the Gita, also many PDFs. Here is one that I think highly of. The print version is available in the bookstores. http://www.bhagavatgita.ru/files/Bhagavad-gita_As_It_Is.pdf) – Useful for Lectures 1 and 2
  7. Raj-Yoga by Swami Vivekananda (available on Amazon) – Useful for Lecture 8
  8. Theaetetus by Plato (Available on Amazon or the Firestone library)
  9. History of Indian Philosophy by R D Ranade and S K Belvalkar (Available on Amazon) – Useful for Lecture 1 and 2
  10. Seneca: A Philosopher in Politics by Mirium Griffin (Available on Amazon or the Firestone library) – Useful for Lecture 3 and 4
  11. ‘A Constructive Survey by Upanishadic Philosophy’ by R. D. Ranade (Available on Amazon) – Useful for Lectures 7 and 8
  12. https://en.wikipedia.org/wiki/Bhagavad_Gita
  13. https://en.wikipedia.org/wiki/Stoicism
  14. https://en.wikipedia.org/wiki/Seneca_the_Younger
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Book-Review by Odile Belmont

Odile Belmont taught French language at the Princeton University as a Lecturer.

In ‘Sapiens and Sthitaprajna‘, Ashwini Mokashi makes an interesting comparison between Sapiens, the wise person in Seneca’s Stoic philosophy, and Sthitaprajna, the sage according to the Indian tradition.

The questions raised in the book seem as relevant today as they were such a long time ago, namely, how can one be wise and happy at the same time.

It was  surprising to find so many similarities between these two ancient philosophies on the topic of wisdom. Both Sapiens and Sthitaprajna must exercise good judgment before acting. They must be free of passions. They set an example by their behaviour.

The author also makes a brilliant analysis of the differences between them. The Stoics thought of acquiring wisdom in preparation for death, with no idea of an afterlife. While in the Gita, meditation and yoga enable one to reach moksha, or liberation, from the cycles of birth and rebirth.

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The Pursuit of Happiness

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By Dr. Ashwini Mokashi

The pursuit of wisdom, virtue, and happiness are lifelong goals, and the process of attaining these goals itself is a worthwhile experience. Such themes from ancient texts continue into contemporary conversation, while the quest for happiness is pursued anew with each new generation. Ancient wisdom has stood the test of time and it behooves us to apply these principles to modern situations.

Bhagavad-Gita’s Answer

The wise person of the Gita, Sthitaprajna, is concerned with what is right action and how to exercise right judgment. In doing so, the sage becomes a Jnana-yogi, and by performing the right actions, the Sthitaprajna also becomes a Karma-yogi.

The Sthitaprajna possesses the following characteristics:

Wise people abandon all desires and have no eager and earnest longings. They have no sense of possessiveness, sense of ‘mine’. They discard their ego (ahamkara) or a sense of pride in themselves. Their concern for the self is absorbed into a concern for the divine. They are tranquil and happy. This state is known as the state of wisdom (sthita-prajna) or the state of Brahman establishment (Brahmi-sthiti). This state is no doubt difficult to attain but once attained, it stays with the Sthitaprajna until the end.

Stoic Seneca’s Answer

The wise person of Stoic Seneca, Sapiens, embodies the ethical tenets of Stoicism, which bring them permanent happiness. Seneca describes how to be wise by incorporating the Stoic ethical concepts such as appropriate actions (kathekonta), what belongs to oneself (oikeiosis), virtue (arete), detachment (apatheia), telos (goal) of living in accordance with nature, knowledge of the laws of nature, which together lead to happiness (eudaimonia). For Seneca, happiness essentially means tranquility and peace of mind, which results from a constant practice of virtue, and intellectual exercise, which is required to perform moral actions. The choice of action may not be conventional, but it is always moral. The integrity of moral thoughts and actions results in tranquility, which leads to happiness. Seneca’s critique of emotions, such as anger and grief highlight both the utility and futility of emotions, which emphasize the need for detachment from passions in the pursuit of virtue.

Similarities

In both systems, a wise person is one who has the capacity for making correct judgments when undertaking action, and for these s/he then assumes complete responsibility. Right thinking results in right action, essential for peace of mind and happiness: right or moral actions lead to virtue. Happiness results from knowing one has done the right thing at the right time. Whatever a wise person chooses to do is for the good of mankind. In that sense, s/he is divine. Such people enjoy constant happiness.

Differences

Seneca’s treatment of various emotions is one of the most unique features of his philosophical writings. Seneca treats different emotions with the skill of a psychological therapist and shows the futility of those emotions in a very logical and sensitive way, without making it sound like a Stoic mandate of denying passions to any individual. Seneca’s great contribution is to make this concept available to everyone by giving people directions instead of merely asking them to rise to a high standard of the ethical expectations of Stoicism.

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This is a repost of the piece first published in the Op-Ed section of the Indian Express on August 12, 2019.

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1100 Views and Counting

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Thank you, Readers, for supporting my blog!

When I published my book or when I began the blog, I remember thinking I would be lucky if I could persuade a handful of my friends to read some philosophical thoughts. Seriously, who reads Philosophy?

Now I know that the articles in English and Marathi languages on this blog have been viewed more than 1100 times from viewers of twenty different countries. Besides the blog views, there are hundreds of views on academic websites, such as researchgate, academia.org.  The TV interview on the Princeton community TV – thanks to Joan Goldstein for inviting me to her show, received the second rank in the ‘Top Ten Views’ of August 2019. An op-ed each in the two newspapers in India, Indian Express and Loksatta, thanks to the Editor of Loksatta Mr. Girish Kuber, received much positive feedback. When my book ‘Sapiens and Sthitaprajna’ was published last year in 2019, the Bhandarkar Oriental Research Institute invited me to deliver the Bapat Memorial lecture, which was well attended. I am most grateful to the Bhandarkar Institute and the Secretary of the Institute, Prof. Shrikant Bahulkar for this honor. The talk at the Bhandarkar was also covered in the local Indian Express, thanks to Anuradha Mascarenhas, a senior Editor in Pune and her team. I must admit that this kind of response is most unusual.

The inspiration for this blog and for the philosophical articles has come mostly from my social work over a period and from studying Philosophy over a lifetime. In the College days, sometimes I would visit the detention facilities in Pune India to teach the kids (of prisoners) stories from ancient Indian texts, or volunteer in the slums of Pune to teach them values of hygiene. In the last few years, I offered some time as a server at the soup kitchen, or as a (trainee) ambulance driver of the Emergency Medical Service in New Jersey, USA. Last few years, I also got an opportunity to observe the work of an Institute ‘Hope Project’ in New Delhi, India, that provided education to the street children. These situations used to weigh on my mind and make me wonder how to help these people solve their problems in life, how to give them perspective on life, so they can support their own lives better. I don’t have the financial means to lift the lives of all the people I would like to help, but I do have some solutions to offer them based on my intellectual work in the field of Philosophy. I decided to do just that. It was only a short span of time that I have spent on my social work, compared to the time I have spent on my family, my career or my research. Yet the influence that these short and intense moments have had on my life is tremendous. It has given me a chance to look at social issues from all angles and figure out what kinds of solutions are possible to any given problem.

If we look at the population of the world in the bell curve statistics, the 15% on the extreme left of the line are unable to handle their lives, as they are too perturbed to function. The 15% on the other extreme can thrive in their lives, thanks to their wisdom, perseverance and available means. The middle population – roughly 70%, have figured out some tricks of how to keep their lives balanced, but not all of them and not always. I have seen many middle-class families suddenly lose most of what they had during the recession years, or due to crisis in their family. They need help too, not just the 15% on the left side of the curve. When we are in a crisis, it becomes too tough to realize whom to trust, whom to turn to and to gather the means to seek solutions. Therefore, it is always important to support our lives and develop the strength to deal with these issues.

Wisdom, perspective and a good understanding of life will help us survive and thrive. It will create more opportunities, more Happiness and less diseases. This was the background for the project of the book and the blog, with the goal of connecting philosophical wisdom to modern issues to help resolve them. Thank you again!

By Ashwini Mokashi

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११००+ वाचकांचा प्रतिसाद 

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धन्यवाद, वाचकांनी माझ्या ब्लॉगचे ११०० पेक्षा जास्त वेळा वाचन करून जे समर्थन केले, त्याबद्दल मनःपूर्वक धन्यवाद!  

मी ब्लॉग सुरू केला तेव्हा मनात विचार केला होता, की माझ्या हातावर मोजण्याइतक्या काही मित्रमैत्रिणींना थोडेफार तत्वज्ञानाचे विचार वाचण्यास जरी मी राजी करू शकले, तरी मी स्वतःला भाग्यवान समजेन. खरंच, कोण वाचतो तत्वज्ञान ?  

या ब्लॉगवरील इंग्रजी आणि मराठीतील माझे लेख वीस वेगवेगळ्या देशांच्या लोकांनी वाचले. याव्यतिरिक्त, शेकडो शैक्षणिकांकडून रिसर्चगेट, अकॅडेमिया व इतर वेबसाइट्सवर  हे लेख वाचले गेले. जोन गोल्डस्टईन यांच्या निमंत्रणावरून प्रसारित झालेल्या टीव्ही मुलाखतीला  ‘टॉप टेन व्ह्यूज’ मधील दुसरे स्थान प्रिन्सटन कम्युनिटी टीव्हीद्वारे मिळाले. एक ऑप-एड लेख इंडियन एक्स्प्रेसमध्ये, तर एक ऑप-एड लेख लोकसत्तामध्ये प्रसिद्ध झाला. त्याबद्दल श्री गिरीश कुबेर या लोकसत्ताच्या संपादकांचे खूप खूप आभार. माझे इंग्रजीतील पुस्तक ‘सेपियन्स अँड स्थितप्रज्ञ’ मागील वर्षी प्रसिद्ध झाले तेव्हा, भांडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्युटने मला भाषण द्यायला आमंत्रित करून जो बहुमान दिला त्याबद्दल त्या संस्थेचे आणि संस्थेचे सेक्रेटरी या नात्याने प्राध्यापक श्रीकांत बाहुलकर यांची मी खूप आभारी आहे. या भाषणाचा वृत्तांत पुण्याहून प्रसिद्ध होणाऱ्या लोकल इंडियन एक्सप्रेस मध्ये केल्याबद्दल मी अनुराधा मसकॅरेन्हास यांची आणि त्यांच्या टीमची पण ऋणी आहे. हे सर्व खूप विलक्षण आहे.

या ब्लॉगची आणि तात्विक लेखांची प्रेरणा माझ्या थोड्याफार केलेल्या सामाजिक कार्याद्वारे आणि आयुष्यभर केलेल्या तत्त्वज्ञानाच्या अभ्यासामुळे प्राप्त झाली आहे. मी  कॉलेजमध्ये  असताना पुण्यातील कैद्यांच्या मुलांना भारतीय तत्त्वज्ञानातील गोष्टी सांगायचे, पुण्यातील झोपडपट्टीत राहणाऱ्या लोकांना स्वचछतेचे महत्त्व पटवून द्यायचे. गेल्या काही वर्षातअमेरिकेतल्या सूप किचनमध्ये वाढपी म्हणून मदत करायचे किंवा न्यू जर्सीमधील आपत्कालीन वैद्यकीय सेवेची  (प्रशिक्षणार्थी) कार्यकर्ता या नात्याने अँब्युलन्स चालवायचे. काही वर्षे मी नवी दिल्लीतील रस्त्यावर राहणाऱ्या मुलांसमवेत त्यांना शिकवण्याचे काम करणाऱ्या एका संस्थेचे (Hope Project) काम जवळून बघितले होते. तेव्हा या लोकांना जीवनातल्या समस्यांचे निराकरण कसे करावे, त्यांना आयुष्याकडे पाहण्याचा दृष्टीकोन कसा द्यावा याबद्दल मला वारंवार विचार पडत असे. या सर्व लोकांचे आयुष्य उंचावण्यासाठी लागणारे आर्थिक साधन माझ्याकडे नाही, परंतु तत्त्वज्ञान क्षेत्रात माझ्या बौद्धिक कार्याच्या आधारे त्यांना सांगण्यासाठी माझ्याकडे काही विचार आहेत. मी तेच सांगण्याचा निर्णय घेतला. मी माझ्या कुटुंबासाठी, माझ्या करिअरवर किंवा माझ्या संशोधनात घालवलेल्या वेळेच्या तुलनेत मी माझ्या सामाजिक कार्यावर फार थोडा वेळ घालवला आहे. तरीही या लहान आणि तीव्र क्षणांचा माझ्या आयुष्यावर झालेला प्रभाव प्रचंड आहे. यामुळे मला सर्व बाजुंनी सामाजिक प्रश्न पाहण्याची आणि दिलेल्या समस्येचे कोणत्या प्रकारचे समाधान होणे शक्य आहे हे शोधण्याची संधी मिळाली. 

Bell Curve

बेल curve च्या आकडेवारीमध्ये आपण जगाची लोकसंख्या पाहिल्यास, रेषेच्या डावीकडील टोकाला 15% लोक आहेत जे आपले आयुष्य सांभाळण्यास असमर्थ आहेत. ते कार्य करण्यास प्रवृत्त होत नाहीत, कारण ते खूप घाबरून गेलेले असतात. दुसऱ्या उजवीकडच्या टोकाला जे  15% लोकं आहेत, त्यांच्या आयुष्यात शहाणपणा, चिकाटी आणि उपलब्ध साधनांमुळे भरभराट झालेली दिसते. या दोन टोकांच्यामध्ये असणारा जनसमुदाय जे अंदाजे 70% लोकसंख्येमध्ये गणले जातात, त्यांचे जीवन बऱ्यापैकी संतुलित असते. जीवन संतुलीत ठेवण्यासाठी काही युक्त्या त्यांना माहीत असतात, परंतु नेहमीच त्या युक्त्या सर्वाना लागू पडतील असेही नसते. मी अशी बरीच मध्यम-वर्गातील कुटुंबे पाहिली आहेत, जी अचानक मंदीच्या काळामध्ये किंवा त्यांच्या कुटुंबातील संकटांमुळे बरेच काही गमावून बसतात आणि हतबल होतात. कठीण समय येता कोण कामास येतो, या उक्तीप्रमाणे  जेव्हा आपण संकटात असतो, तेव्हा कोणावर विश्वास ठेवायचा, कोणाकडे जायचे आणि कुठले उपाय शोधायचे, हे समजणे फार कठीण होते. म्हणूनच, आपल्या जीवनाचे समर्थन करणे आणि या समस्यांना सामोरे जाण्यासाठी आंतरीक सामर्थ्य विकसित करणे नेहमीच महत्वाचे आहे.

ज्ञान योग, बुद्धीचा वापर, सकारात्मक दृष्टीकोन आणि जीवनाची चांगली समज आपल्याला जीवन जगण्यास आणि भरभराट करण्यास मदत करेल. यामुळे अधिक संधी निर्माण होतील, अधिक आनंद मिळेल आणि आयुष्यावर होणारे दुष्परिणाम कमी होतील. पुस्तकाच्या आणि ब्लॉगच्या प्रोजेक्टची ही पार्श्वभूमी होती, प्राचीन ज्ञानाचा आधुनिक समस्यांशी समन्वय करून त्या समस्यांचे निराकरण करण्याचा हा छोटासा प्रयत्न आहे. या प्रयत्नात सामील झाल्याबद्दल पुनःश्च धन्यवाद!

© लेखिका : अश्विनी मोकाशी

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आर्किलोचस

आर्किलोचस , (इ.स.पू. 650, पारोस [सायक्लेडिस, ग्रीस]), हे एक कवी आणि सैनिक होते.  हे इम्बिक, एलिगिएक आणि वैयक्तिक लय कविता यांचे प्राचीन ग्रीक लेखक होते.  त्यांचे लिखाण अत्यंत उत्तम प्रतीचे असून काळाच्या ओघात काही प्रमाणात अजून टिकून राहिले आहे. फार क्वचित कोणी कवी आणि सैनिक असलेले आढळतात. अर्चिलोचस यांनी आपला सैनिकी बाणा आणि पवित्रा आपल्या कवितेत आणला. त्यांची कविता होमर आणि हेसिओड यांच्या पंक्तीमध्ये त्यांना बसवते. तसेच त्यांना एलिजि या काव्यपद्धतीचे जनक मानले जाते. 

आर्किलोचसचे वडील टेलीसिकल्स एक श्रीमंत पारियन होते, ज्याने थासोस बेटावर वसाहत स्थापन केली. अर्चीलोचस स्वतः पारोस आणि थासोस या दोन्ही बेटांवर राहत होते. त्याच्या कवितेत इ.स.पू. 6 एप्रिल रोजीचे सूर्यग्रहण आणि लिडियन राजा गेजेस (इ.स. 680-645 ईसापूर्व) च्या संपत्तीचा उल्लेख आहे. 
प्राचीन चरित्रात्मक परंपरेतील आर्किलोचसच्या जीवनाचा तपशील बहुतेक त्याच्या कवितांतून घेण्यात आला आहे – त्यामुळे त्यात त्याने वर्णन केलेल्या घटना काल्पनिक असू शकतात.
परंतु आधुनिक शोधांनी कवितांमध्ये दिलेल्या चित्राचे समर्थन केले आहे. पारोसवरील पवित्र भागात आर्किलोचसला समर्पित दोन शिलालेख सापडले; ते या दोन पुरूषांच्या नावे आहेत: मॅनेसिप्स शिलालेख (तिसरे शतक बीसीई) आणि सोस्थेनिस शिलालेख (पहिला शतक बीसीई). अथीनियन राजकारणी आणि बौद्धिक समीक्षकांनी आर्किलोचसच्या स्वत: च्या वर्णनास  5 व्या शतकाच्या उत्तरार्धात गांभीर्याने पाहिले होते.  आर्किलोचस याने स्वत: ला गरीब, भांडखोर, दु: खी, गुलाम महिलेचा लबाड मुलगा म्हणून आपले वर्णन केल्याबद्दल त्याची निंदा केली. त्यामुळे  काही विद्वानांना असे वाटते की त्याच्या कवितांमध्ये चित्रित केलेले आर्किलोचस यांचे वर्णन खरे नव्हते.

आर्किलोचस सैनिक म्हणून काम करत असत. थसॉसच्या जवळ असलेल्या मुख्य भूभागावर थ्रेसियन्सविरूद्ध त्याने लढा दिला आणि जेव्हा थॅशियन्स नॅक्सोस बेटावरील सैनिकांविरुद्ध लढत होते तेव्हा तो मरण पावला. एका प्रसिद्ध कवितेत आर्किलोचस स्वत: ची ढाल लढाईत फेकल्याबद्दल कोणतीही संकोच वा खेद न करता सांगतात. (“मी माझा जीव वाचवला. मला माझ्या ढालीची काय किंमत आहे? गेली उडत! मी आणखी एक विकत घेईन.”) 

कविता व इतर पुराव्यांवरून सत्यता निश्चितपणे समजणे कठीण असले तरी आर्किलोचस विवादास्पद असू शकेल. कारण ते आपल्या तीक्ष्ण विनोदाबद्दल आणि निंदात्मक भाषेबद्दल प्रसिद्ध होते. 
त्यानी खूप वेगवेगळ्या प्रकारची लयबद्ध रचना त्याच्या कवितेत करून ग्रीक भाषा समृद्ध केली. ते  अतिशय सहजपणे होमरिक भाषेमधून दैनंदिन जीवनाच्या भाषेचा वापर एकाच ओळीत करू शकायचे . वैयक्तिक अनुभव आणि आपल्या भावनांबद्दल लिहिणारा तो पहिला युरोपियन लेखक होता. ग्रीक कवितांचे विषय नेहमी  वीर योद्धे किंवा प्राचीन सूत्रे असे असायचे. त्यामुळे त्याच्या कवितांचे वेगळेपण दिसून आले. त्याने त्याच्या कवितांमध्ये  वैयक्तिक भावनांचा उहापोह केला. होरेस सारख्या नंतरच्या नावाजलेल्या कवींनी त्याच्या शैलीचे आणि कौशल्याचे खूप कौतुक केले. परंतु पिण्डार सारख्या काही नावाजलेल्या कवींनी त्याच्या अनैतिक वागण्याची निंदाही केली. 

© लेखिका : अश्विनी मोकाशी

References:Encyclopaedia Britannica, Wikipedia, Greek Language Mosaics at greek-language.gr

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Upanishads and the Cure for Loneliness

A Constructive Survey Of Upanishadic Philosophy: Being An Introduction To The Thought Of The Upanishads (An Old Book)

By Ashwini Mokashi, Ph.D.

Introduction

Loneliness is a major problem in the current times. This article tries to address the issue of loneliness and the cure for it from the ancient wisdom of Hindu Philosophy. We will take three principles to address this issue from the Indian philosophical texts of the Upanishads and will also rely on the mainstream teachings of the Upanishads, mainly their insistence of the practice of meditation.

Upanishads are India’s great heritage. The twelve main Upanishads were composed before the common era and were passed on through the oral tradition. The genesis of the Hindu religion and Buddhism is found in the Upanishads. There is neither religious nor social rift implied in these texts, as they preceded any religion.

Many scholars have written about the Upanishads. One such great name was Prof. R.D. Ranade. His book ‘A Constructive Survey of the Upanishadic Philosophy’ was published in English around 1926 and soon became one of the most respected and well-read pieces of literature on the Upanishads.[1] We will take a page from this book and let it guide us to examine how loneliness can be decreased or cured with the advice from the Upanishads.

Perennial Values

The contemporary Indian society is caught between religious divisions, casteism and various other isms; likewise, the contemporary American society is caught between political, racial, religious divides as well as various issues of what constitutes political correctness. One encounters these challenges daily. For example, before making any new friends, we tend to assess whether we have similar thoughts, similar religion, similar political views, similar beliefs on social issues, similar social class, what do people say about them, will the friendship benefit us, what will they think about us – all these thoughts become constraints and conditions and we happily impose them upon ourselves, thereby making it very difficult for us to reach others and make friends.

This creates a sense of loneliness and induces physical and mental illnesses. Loneliness arises when one is either without family or friends close by, or when one feels that one’s family or friends do not understand one’s inner turmoil and at times, one’s irrational thoughts. This thinking-out-loud with friends is also a process of checking the validity of one’s thoughts to arrive at a rational course of action. How does one go beyond these constraints to find a good solution for making friends? Ancient wisdom comes in handy in this process, helping us examine the values and principles of life. These values are perennial and hence they seem fresh even today. They are concerned with absolute universal values and not short-term goals; hence they become applicable across the board, irrespective of differences of class, caste, color, religion, age, race, sex, origin etc.

Interconnections

The first principle I would like to consider is from the Isha Upanishad, Yasmin sarvani bhutani atmaiwabhudvijanatah, which means that one should think of another human being as an end and not as a means to an end. With this attitude, it becomes easier to respect another human being. It enables one to make friends with others, have compassion for others, reduce the divide between us and them, and help them in times of need. All human beings are representatives of the Atman, and we all share the same principle of the Atman in ourselves. Hence, we are all connected to each other. When one understands that, one does not discriminate against another person based on their caste, color, religion, class, etc. Instead one starts wondering, how we would act, if we had to walk in their shoes.

The philosophy in the Upanishads is very compelling, aside from their linguistic beauty and the wonderful stories. For example, what is the principle of ‘Know Thyself’? How does one understand that, how does one get to know oneself and if we don’t know ourselves, then how do we tell people our opinions? How do we remove any misunderstandings about ourselves? When do we form our opinion? Normally it is necessary for us to understand ourselves. Our growth and development are essentially tied up with that knowledge. As we understand ourselves, our inner self, our soul better, then our inner strength, our sense of contentment grows, loneliness decreases, and we are better able to face the ups and downs of life.

That Thou Art

The second principle I would like to consider is found in the Isha and Maitreya Upanishads, which is ‘Soham – sah aham’ or ‘That thou art’. It means that the concept of Brahman – known as sah or that, is within me. One can understand that by either thought process – Jnana Marg, or through meditation – Bhakti Marg and by doing the right deeds – Karma Marg. These pathways enable us to get closer to the Atman. The Upanishads have a lot of passages that talk about how to understand the principle of ‘Know Thyself’ and how to complete one’s journey towards Moksha. When the individual soul (Atman) and the universal soul (Brahman) become one, then a human being achieves Moksha. In practical terms, one understands that it is important to treat another individual as a soul, with respect and dignity.

To understand these and many other philosophical issues, one must understand the principles behind them. The Upanishads have a lot of discussions of philosophical issues. The Ken Upanishad says that humility is extremely important for the knowledge of the Atman, the knowledge of the self. Without humility, one does not understand the Atman. Perhaps the same principle applies to making friends. It we do not treat others with politeness and humility, no one will want to be friends with us. Perhaps the Upanishads want us to learn these principles in small steps.[2]

Infinite Power of Mind

Prof. Ranade gives an example from the Mundaka Upanishad of the two birds that represent Jiva (the individual soul or Atman) and Ishwara (the Universal soul or Brahman), living on the same branch of a tree. The Atman would tend to be unhappy thinking of itself as a helpless creature. But when it unites with the Brahman, it realizes that it is a part of the infinite power and hence it stops feeling sad and becomes extremely happy. The Atman realizes that it is not alone but is an integral part of the universe. This refers to our third principle, quoted from the Mundakopanishad.

Dva suparna sayuja sakhaya samanam vriksham parishasvajate |
tayoranyah  pippalam svadvattyanashnannanyo abhicakashiti || 1|| (3.1.1 Mundakopanishad).

Likewise, when one tries to follow the purpose of one’s life, one becomes happy. Then there is no fear, nor any loneliness. Hence with the consult of the Upanishads, it is possible to lead one’s life with patience, courage and morality. This will enable us to understand the principle ‘Know Thyself’ and ease our way in our pursuit of happiness.

The Chhandogya and Maitri Upanishad discuss the importance of the mind. Mind is the genesis of all thoughts and emotions. A person sees and hears through the mind with the help of the sense-organs.[3] Our emotions are governed by our mind; hence one can choose whether to be afraid of or be thrilled about something. When the mind is ruled by the intellect, then one can take a good decision. None of this is easy, of course. As we keep practicing taking good decisions, we see incremental growth in our confidence, self-love (as in love for the Atman, and not as narcissistic egoism) and self-respect (respect for the Atman). It is considered as spiritual progress.

Meditation and clear thinking can help us practice this further. This practice also enables us to gain an understanding of the world at a different plane, such as through intuition. For example, one can understand who likes us or who does not like us, merely by consulting with one’s own mind. One can also understand who is telling us the truth and who is being deceptive. Similarly, we also have a sense that we are not alone in this world, and that we are connected to the Brahman (also known as the universal soul, or the Ultimate Reality) that protects us, and this knowledge helps cure loneliness and fear. This does not mean however that one should not take care of oneself in practical ways. But it means that one understands one’s role and importance in life and life becomes blissful.

Conclusion

It is possible to cure or limit the sense of loneliness by understanding the perennial values, following the path of humility, understanding the power of mind, practicing meditation and believing that we are a part of the infinite power of the Brahman.[4] In practical terms, extending a hand of friendship to others, being respectful towards others, controlling one’s anxieties and appreciating the positive aspects of our situation would help us connect better with other members of the community and ultimately help us improve our sense of connectedness, resulting into a substantial decrease in loneliness. Besides, loneliness can be transformed into bliss, when one understands that the real source of happiness or bliss is within the Self for the one who seeks the Brahman (the Ultimate Reality) and that is when the Upanishadic teaching has matured in one’s life.


[1] It was translated into Marathi by Prof. K.V. Gajendragadkar under the title ‘Upanishad-rahasya’.

[2] A Constructive Survey of the Upanishadic Philosophy, R. D. Ranade, 2002, Bharatiya Vidya Bhavan, page 25

[3] A Constructive Survey of the Upanishadic Philosophy, R. D. Ranade, 2002, Bharatiya Vidya Bhavan, page 118

[4] A Constructive Survey of the Upanishadic Philosophy, R. D. Ranade, 2002, Bharatiya Vidya Bhavan, page 348

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REFLECTIONS ON ARISTOTLE’S CRITICISM OF FORMS

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I

Introduction

The most celebrated doctrine of Plato, his ‘Theory of Ideas’, which is the center of his philosophy, faces some acute problems. This theory is very harshly attacked by the critics, and therefore, it stands in need of re-examination. A critic like Aristotle shows the invalidity of the argument in its favor with his contra-argument, viz, the ‘Third-Man’, which forced Plato either to relinquish his theory as a whole or to declare it invalid. This history is as repeated as the same argument was earlier put forth against the doctrine by Plato himself in one of his late dialogues, Parmenides. Plato deserves full credit for the demonstration of the rarest gift of self-criticism. But then, how is it that in spite of seeing the drawbacks and lacunae in the theory, he does not abandon it? What is the reason behind it? Did the extra-sensitive mind of Plato not catch the point of criticism or not comprehend the problem really? Certainly, he did. He himself was the pioneer of the arguments against his own theory. Yet he stands irrefuted on the grounds of the consistency in his philosophy. A twentieth century philosopher Kurt Goedel’s famous theorem says that ‘No philosophical system can be both complete and consistent’. Plato’s theory was consistent but not complete. To be reassured of this claim, let us pursue this interesting issue of the Third-Man argument further.

We shall discuss the issue from the following points of view:

  1. Brief account of Aristotle’s basic criticism of the theory of forms:
  2. What exactly is the argument of Third Man?
    1. Aristotle’s formulation
    2. Plato’s formulation in the Parmenides
  3. Some contemporary reflections on the Third-Man Argument
  4. Evaluation

II

Brief Account of Aristotle’s Basic Criticism of the Theory of Forms

A brilliant and devout disciple of Plato, Aristotle was in his academy for more than a decade. How greatly he was influenced by Plato and Platonic philosophy is seen in his humble apology, which says, “It is commendable and even obligatory in defense of truth to abandon one’s own cherished convictions, especially in a philosopher: for though both are dear to us, it is a sacred duty to give the preference to truth.[1] With such reverence Aristotle proceeds to examine the doctrine of Ideas in his book Metaphysics.

To demonstrate the inconclusiveness and invalidity of Platonic theory of Ideas, Aristotle presents the following arguments[2]:

  1. Those who first proposed the Ideas as causes were in effect doubling the number of things to be explained, as if a man wished to count a few things, but imagined he could not do so, unless he added to their number.
  2. None of the arguments is valid. Some of them are inconclusive, the others would prove there are forms of things of which we maintain there are one. Thus, (a) the argument from the existence of sciences would prove that there are Forms of all things of which there are sciences; (b) the argument of One-over-Many would prove that there are forms of negations; (c) the argument that we can think of what has perished would establish Forms of perishables, because we retain a mental image of the latter: (d) some of Plato’s more closely reasoned arguments explicitly imply Ideas of relative terms, while others mention the ‘Third-Man’.
  3. The arguments do away with what we value more than the Ideas: they make number prior to the dyad, the relative to the absolute; and they open the doors to all those later developments which conflict with the very principles of the theory.
  4. If the Forms are participated, there can be Ideas of substances only; for they are not participated as accidents of a subject that is directly shared in and none can be participated except in so far as it is not predicated of a subject. So, the Forms must be substances. But the same words must denote substance in the sensible as in the Ideal world. Otherwise what is the relation between the two worlds?
  5. The main difficulty: What do the Forms contribute either to eternal or to transient sensibles? For, (i) they cause no motion or change in them; (ii) since they are not in them, they are not their substance, and therefore, contribute nothing either to the knowledge of them or to their being.
  6. To call the Forms ‘patterns’ and to assent that other things ‘participate’ in them is to take an empty metaphor, for there can be different patterns of one and the same thing. Thus, the species will be the pattern of the individuals, but the genus will be the pattern of the species, so that one and the same thing will be both pattern and copy.
  7. It is manifestly impossible for that which is the ‘substance’ of a thing to exist apart from it. How then can the ideas, which are supposed to be the substances of things, exist apart from them?
  8. If forms are numbers, in what sense are they causes? If it is because things inthis world are other numbers, then how does one set of numbers cause the other. Notwithstanding that the former is eternal and the latter not?
  9. One number may be composed of several other numbers, but how can one Form be composed of several other Forms? If it is produced not from numbers, but from units in them, in what relation will the units stand to one another?
  10. How are the intermediates derived? Why should they be considered intermediate between things here and ideal numbers?
  11. Each unit in the number two comes from a previous two, which is impossible.
  12. What constitutes the unity of the one number understood collectively?
  13. If the units are dissimilar, they should be names, just as those who assume two or four elements name them; and if there is absolute One, the word ‘One’ must have a variety of meanings. But this is impossible.
  14. While tracing substance from their princicples, we Platonists derive lines from long and short. But how can the plane contain a line or the solid a plane? Thus, the argument which established the line established a point.
  15. The Platonists have abandoned the search for the causes of sensible phenomena.
  16. The Forms have no connection with the final cause, with which sciences are concerned.
  17. How can we obtain knowledge of the objects of a given sense unless we possess that sense? And yet it should be possible, if the elements of which all things consist are the same.

Aristotle’s realism forms itself through the criticism of Platonic arguments. His main criticism was that Plato unnecessarily thought that the universals exist outside the things and separately. The particulars get their names because of their universals and are bound by them in a way of participation or imitation. But participation is not possible because

  1. If one Idea participates in many sensibles, then it will be divided. In that case, an Idea will exist apart from itself, which is absurd.
  2. The source of Idea will remain inexplicable, because of its division:
  3. If the Idea participates in contrary attributes, then contrary attributes belong to it at the same time. If it does not participate in them, then we cannot account for different attributes.[3]

Thus, the root cause of the matter lies in the relation of participation. The Third-Man Argument is developed from the lacunae in the argument of participation.

III

What Exactly is the Argument of ThirdMan?

Aristotle has coined this term. “If that which is predicated truly of several things also exists in separation from these, there will be a Third-Man. For, if the predicate ‘Man’ is different from its subject and exists independently of them, and the predicate Man is used in the context of both the particular men and of the Idea of man, there will be a Third Man apart from both particular men and the Idea. Similarly, there will be a fourth man predicated both of the third man, particulars and idea, and similarly a fifth, and so on, ad infinitum.”[4]

Plato’s formulation of this argument in Parmenides[5] is very much similar to that of Aristotle, though chronologically it belongs to an earlier date. Parmenides also mentions the uselessness and infinite regress involved in the argument for Ideas. Two factors are held responsible for the rise of this argument.

  1. The dilemma of participation, i.e., whether the whole or the part of an Idea is participated in the thing
  2. The assumption that as Ideas are separate from sensibles, sensibles are also separate from Ideas.

The latter presumption is found both in the Parmenides, and in the Metaphysics.

Parmenides starts off with the defense that Ideas are paradigms and participation is only possible with resemblance. Thus, the dilemma of participation resolves itself, since the Ideas are not in their participants. Parmenides, the dialogue, does not stop there, but comes up with further arguments, which are as follows:

  1. The Symmetry Assumption: If the participant is like the Idea, then the Idea is like the participant. Continual generation of a new character will never stop if the character happens to be like what has a share of it.
  2. The One-over-Many Premise: If one thing is like another, those two things must have a share of one and the same Idea. Therefore, it is necessary, that that of which like things have share, so as to be like, should be the Idea itself.
  3. The Likeness Regress: It is impossible for anything to be like the Idea or the Idea like anything else; otherwise another idea will turn up beside the first, if the Idea is like what has a share of it, and so on, ad infinitum. Hence, the claim that participation is resemblance implies the regress. If the regress is absurd, then the premises leading to it must also be rejected.
  4. The Third-Man: If a and b are like in respect of c, then a is like c and c like a in respect of d, and so on. This regress requires some further Idea at every stage but does not specify what further Idea at any stage. Thus, the Ideas are present only where things are like in some respect. In a way, the argument implies the limitation of extent.

Thus, the mistake of Third-Man is committed in the attempt of solving the dilemma of Participation. As in all philosophical problem, we should not look for solutions of the problems, but to know how the problems are presented. Here we see that Aristotelian presentation of this problem is in coherence with the Platonic presentation. So, the data is the same, only the form is different. The essence of the argument is the same, only the framework different. Hence, the critics might face another question, as to why Aristotle is given the credit of this argument, when the origin is placed right back in Plato. But we will not go into this problem for the time-being. Instead, we will move to the understanding of some contemporary scholars on this issue.

IV

Some Contemporary Reflections on the Third Man Argument

We may pick up the work of Gregory Vlastos[6] as representative to his era. He talks about the Third-Man Argument, while focusing his attention on the Parmenides. He deals more with the technical grounds of the argument as devised in the Parmenides than with the essence of the argument or with the argument as a whole. No doubt, he considers the argument as impressive and instructive, but fatal. Let us have a brief review of his understanding of the argument.

Out of his two essays, Vlastos divides the first essay, in Text and Logic of the Parmenides. In the first part of the essay, he says the unity of Forms is being taken for granted in the Parmenides. When the talk is actually about participation, there is not much discussion about it, i.e., when Parmenides asks Socrates, if there exist certain Forms by participation in which the other things get their names, e.g., similar by participating in similarity, etc.

Further, Vlastos constructs a logical hypothesis[7] which he says would be refuted in the Third-Man Argument:

  1. If any set of things share a given character, then there exists a unique Form corresponding to that character, and each of these things has that character by participating in that Form.
  2. A) a, b, c are F.
  3. B) There exists a unique Form (which we may call F-ness) corresponding to the character ‘F’ and a,b,c are F by participating in F-ness.
  4.  If a, b, c and F-ness are F, then there exists a unique Form (which we may call F-ness II) corresponding to F, but not identical with F-ness, and a, b, c and F-ness are F by participating in F-ness II.

2. a) a, b, c, and F-ness are F.

2. b) There exists a unique Form (which we may call F-ness II) corresponding to F, but not identical with F-ness; and a, b c and F-ness are F by participating in F-ness II.

If Parmenides can go as far as 2. B, he will have refuted the claim of the Third-Man. “If one, then infinitely many” is so much more impressive, than ‘if only one then two’ though the latter is as fatal to the refutand as is the former, says Vlastos.

The second essay of Gregory Vlastos[8] talks about the Third-Man Argument in a more definite way. The logical formulation of his argument is as follows:

The First Version:

  • 1) If a number of things a, b, and c are all F, there must be a single Form F-ness in virtue of which we apprehend a, b, c as all F. The difficulty here is that another Form will always appear on the scene.
  • 2) If a, b, c and F-ness are all F, then there must be another Form, F-ness, in virtue of which we apprehend a, b, c and F-ness are all F. To make this argument sound and legitimate, we need the self-predication assumption (A. 3)
  • 3) Any form can be predicated of itself F-ness is itself F.
  • 4) Non-identity assumption: If anything has a certain character,it cannot be identical with the Form in virtue of which we apprehend the character. If X is F, X cannot be identical with the Form in virtue of which we apprehend the character. If X is F, X cannot be identical with F-ness.
  • 5) If F-ness is F, F-ness cannot be identical with F-ness.
  • 5a) If any particular has a certain character, then it cannot be identical with the Form in virtue of which we apprehend that character.

Vlastos picks up the argument numbered A.5a, and claims that a, b, c are all apprehended as F in virtue of F-ness itself. The existence of F-ness would remain unproved, so also the existence of all subsequent Forms. The infinite regress would not materialize. Therefore, he blames Plato for not having identified all the necessary arguments leading to the second argument in the Third-Man, which is the main source. Thereby Plato reveals his innocence of all the necessary arguments as well as his uncertainly about the validity of Third-Man Argument.

V

Evaluation

Finally, the problem still remains as to how do we account for the fact that Plato does not seem to see the Third-Man Argument as fatal to philosophical outlook in the way Aristotle does. We have seen that it has been the fashion to judge Plato’s theory from Aristotle’s perspective. The arguments presented in this essay earlier have been integral arguments and they try to catch Plato in words on technical grounds. But they do not take the argument as a whole into account knowing the essence of Plato’s arguments and knowing the consistency of this theory in Platonic philosophy. We would like to take a different stand, in order to defend Plato on his own merit.

The philosophical force of a logical thesis is partly determined by the conceptual framework in which it is made. Its corollaries are:

  1. The same logical thesis may be made in different conceptual systems.
  2. The force of the thesis depends on the kind of system in which it is made.

Thus, it is necessary to understand the theory in its own framework. Hence, we will consider our method more clearly, so that the way we handle this Platonic problem will be absolutely unambiguous.

The nature of the conceptual system or framework is determined by

  1. The formulation of the basic problem/s,
  2. The methodological presupposition/s,
  3. The type of regulative analogies or metaphors around which it is built up.

This method will yield results to our problem, on thorough examination of Plato and Aristotle’s outlook along with these three dimensions. So now, without going into the details of their philosophies, let us consider the crux of the matter.

  1. Formulation of the Basic Issue:

Plato’s metaphysics is linked with his epistemology. His understanding of Reality can be put forth in the following manner: “Given that mind can have knowledge (episteme) of reality, what should reality be like? It is very well agreed that the soul has episteme and episteme is essentially different from doxai.” Thus, Plato approaches Reality from the standpoint of man. His process is anthropocentric.

His theory of knowledge is a good proof for his argument that the soul has episteme. The very life of Socrates is a live instance of it. As we find the reference in the dialogue Apology that even the Gods regarded Socrates as the wisest of all men. Secondly, Plato talks about two conditions of knowledge, namely the universality and certainty. And only Forms could fulfil these two conditions. Thus, Plato gives stress on the impossibility of relativism in the process of knowledge, i.e., there is no knowledge of particulars, since knowledge is permanent, whereas particulars are not.

The second important argument is that the episteme is different from doxai. Knowledge is related to our mental ability, though it is knowledge of something, whereas beliefs are related to the things, though they are beliefs in our mind. Knowledge enriches our mental power, whereas beliefs only make us well-informed. Just as there is only one mind, knowledge can also be only singular. Whether it is knowledge of one Form or many, it is the power of mind or soul to be capable of grasping their nature. In short, the argument is supported by the two factors, namely, (1) conceptual analysis of knowing and believing and (2) anthropological presupposition that a distinct power has distinct objects. This was the review of Plato’s outlook towards the problem.

When we go to Aristotle, we find the whole approach is reversed in a certain manner. The Aristotelian understanding of Reality would be –

‘Given that the world is what it is in common experience how should we understand man’. Thus, the Aristotelian problem would be how to understand man. His approach is from reality towards man, i.e., cosmocentric.

Thus, the methods of these two great philosophers are exactly reversed and opposite of each other.[9]

Aristotle deals with this problem on three levels, viz, epistemological, logical and metaphysical. The epistemological explanation of the above argument is the primacy of sense perception in the process of knowledge. Aristotle agrees that we have knowledge of universals. But the universals are not outside the things; we know them, when we perceive the things. So, the actual perception is essential. The logical point would be the way every individual thing is treated as a primary substance. Every substance has two aspects – matter and form. The one without the other is an abstraction and unreal. These properties make the thing what it is and just this particular thing and not another thing. The metaphysical aspect is that the reality of change or becoming implies the notions of potency and actuality. In order to understand the development of substance, we have to reinterpret matter and form as potentiality and actuality. We can explain it with an illustration as, the acorn is the potentiality of there being an oak tree and the oak tree is the actuality of the acorn.[10]

  1. The Methodological Presuppositions:

Plato: The order of being is modelled on the order of the soul. What is primary to soul is also primary in reality.

The myth of divided line, the Form of the Good and the myth of the Sun are the best examples to illustrate the point. In Platonic philosophy, myths are designed to say what is too subtle and elusive to be said. The myth of divided line explains the notion of ascent and the placement of different souls in a hierarchical order. The Form of the Good shows us the ultimate point a human being could reach and be pure. Like the Sun, the Form of the Good illumines and makes our level of knowledge meaningful. These myths are based on human experiences and are also applicable to the reality. Plato makes full use of the capacity of human being and by drawing our attention to the highest aspiration, he also draws the limits of reality. We find the same idea later in Wittgenstein also, when he says, “the limits of our language are the limits of our world.”

Aristotle: The distinction between order of being and order of knowing; the first in itself should also be the first for us. Knowing as an adaptation to being is conditioned by the natural powers of the soul.

As we saw earlier, the Platonic approach towards Reality is anthropocentric. He thinks in terms of the requirements of the human soul and the ways to its satisfaction. According to his distinction, the sensible or the actuality of sense-experience lies at the lower level, whereas the true Reality or Ideal Being stands on the higher order of Reality, which alone is capable of satisfying the demands of the soul.

On the other hand, Aristotle’s cosmocentric point of view states that the man is knower. Man has the natural potency to understand the development as an actualization. This understanding of actual on the part of sense-experience is also ideal, since it corresponds to the reality. It is only in understanding that we can divide reality into matter and form, and also be capable of thinking them as separated substances, which in actuality they are not. Thus, the mind knows the world and itself becomes the expression of the world.

  • Regulative Categories:

We can account for the basic difference between Platonic and Aristotelian philosophy to the basic temperamental difference between the two of them. Both of them were mainly concerned with the problem of how to understand reality. Plato took the support of epistemology in order to build his metaphysical theory. Aristotle was also a realist. But he made efforts to correct Plato’s theory of epistemology, in order to have his theory of realism. Plato was an idealist and found all the answers in the utopian, but perfect solutions. He constructed the ideal theory of other world but was not much bothered with the fact whether it was practically possible, whereas Aristotle was a down to earth practical person. He could not see the sense in the other world theory. For him, the world of our experience was not a remove from the real world, but the real world itself. Therefore, he tried to rationalize the problem of this world, with the assumption that this world is real. And therefore, we find the explanation for change, growth, becoming, development and embodiment in his philosophy, whereas the terminology in Plato is totally different. For him, the world is static, because the ideals cannot accept any change, since they are perfect in themselves. Therefore, the purity, simplicity, perfection and immutability of Forms are the ways of how we explain the nature of Forms and thereby the world. This is the reason why Plato always derives his examples from mathematics, which is the absolute and perfect science. Aristotle finds his illustrations in biology with imperfect but growing and living entities.[11] Hence it is very natural that Platonic utopian approach would clash with Aristotle’s realistic approach. To summarize, Plato understands actual as standing after the Ideal or as one step removed from reality. Aristotelian outlook is exactly reversed, the ideal is to be understood as what the actual is capable of, i.e., giving substantial importance and primacy to the existence of this world.[12]

By – Ashwini A. Mokashi

Department of Philosophy, University of Poona, Pune 411007 – Year 1990

Published in the ‘INDIAN PHILOSOPHICAL QUARTERLY’, 17 (1990) PP 1-16


[1] Gajendragadkar, K. V.: Aristotle’s Critique of Platonism, p 70

[2] Aristotle: edited by Hutchins, R.M. Britannica Great Works, Volume I, p. 208

[3] Gajendragadkar, K.V.: op cit, p 28

[4] Plato’s Parmenides, translation and analysis by Allen, R.E., p. 165

[5] Ibid, p. 168

[6] (a) Gregory Vlastos: Platonic Studies (b) Vlastos, G: Studies in Plato’s Metaphysics, edited by Allen, R.E. ‘The Third-Man Argument in Parmenides’

[7] Vlastos, Gregory: Platonic Studies, page 348

[8] Vlastos, Gregory: Studies in Plato’s Metaphysics, edited by Allen, R. E. p. 232

[9] R. Sundara Rajan: “Reversal and Recognition in Plato” Indian Philosophical Quarterly, Volune XV, No. 1. Jan.88, pages. 64-68

[10] W. J. Jones: History of Western Philosophy, p. 186

[11] Ibid, p. 182

[12] I am immensely grateful to Prof. R. Sundara Rajan, who helped me at various stages in writing this paper.

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उपनिषदांची साथ आणि एकाकीपणाचा ऱ्हास

A Constructive Survey Of Upanishadic Philosophy: Being An Introduction To The Thought Of The Upanishads (An Old Book)

उपनिषदांचा अभ्यास हा आपला खूप मोठा ठेवा आहे. आपली संस्कृती समजण्यात आणि जपण्यात मराठी लोकं नेहमीच अग्रेसर असतात. त्यामुळे प्रत्येक नवीन पिढीला आपल्या संस्कृतीचा वारसा सोपवणे आणि त्यांना आपल्या भारतीय असण्याचा अभिमान निर्माण करणे, या सगळ्या बाबी यात ओघाने येतातच. हे वाचताना त्या वाङ्मयाचे सौंदर्य पण अनुभवता येते. महत्त्वाची बारा उपनिषदे इसवीसनापूर्वी लिहिली गेली आणि ती पिढ्यानपिढ्या पाठांतर करून शिकविली जायची. हिंदू आणि बुद्ध धर्माची बीजेपण उपनिषदात आढळतात. धर्मांच्या अगोदरचे हे जे लिखाण आहे, त्यात धर्माची व्याख्या नसल्यामुळे यात सामाजिक अथवा  धार्मिक भेदाभेद असण्याचा प्रश्न येत नाही.  

उपनिषदांवर बऱ्याच अभ्यासकांनी लेखन केले आहे. त्यापैकीच एक महान लेखक होते प्राध्यापक रा. द. रानडे.  त्यांचे पुस्तक ‘अ कंस्ट्रक्टिव्ह सर्वे ऑफ द उपनिषदीक फिलॉसॉफी’ इंग्लिशमध्ये आहे. ‘उपनिषदरहस्य’ हा त्याचा अनुवाद आहे. अनुवादकार होते प्राध्यापक कृ वे गजेंद्रगडकर. १९२६ ला प्रसिद्ध झालेले हे पुस्तक लवकरच खूप मान्यता पावले आणि उपनिषदांच्या अभ्यासात अग्रगण्य समजले गेले. या पुस्तकाच्या आधारे आपण आज उपनिषदांच्या साहाय्याने एकाकीपणाचा कसा ऱ्हास होऊ शकतो याचा विचार करूया.

आजचा समाज धर्म, जाती आणि वेगवेगळे isms यात खूप अडकून पडतो आणि पदोपदी आपल्याला त्याचा प्रत्यय येतो. कुणाशी मैत्री जोडताना आपण आधी खात्री करून घेतो की त्या व्यक्तीचे आणि आपले विचार जुळतात का नाही, त्यांचा धर्म कुठला, त्यांचे राजकारणावरचे विचार कुठले, सामाजिक विषयांवर त्यांना काय वाटते, त्यांची आर्थिक परिस्थिती कशी आहे, समाजात त्याच्याबद्दल काय समज आहेत, आपल्याला त्यांचा फायदा होईल का नाही, ते आपल्याबद्दल काय विचार करतील. अशा सगळ्या आपणच निर्माण केलेल्या अटींमुळे इतरांपर्यंत पोचायला आणि समान विचारांचे मित्रमैत्रिणी शोधायला फार वेळ लागतो. याने एकाकीपण वाढते आणि त्रास होऊन शारीरिक आणि मानसिक आजार बळावतात. बरेचदा कुटुंबात राहून देखील लोकांना एकाकीपणाची जाणीव होते. शिवाय नोकरीच्या निमित्ताने देखील बऱ्याचवेळा आपल्या माणसांपासून दूर राहावे लागते. या सगळ्या कसोटींचा सामना करताना त्या गोष्टींच्या पलीकडे जाऊन मार्ग शोधण्यासाठी आपल्याला या प्राचीन संस्कृतीचा अभ्यास करणे उपयोगी ठरते. ते कसे तर, तिथे जीवनाच्या मूल्यांचा विचार आहे आणि ती कालाबाधीत असल्याने आजही ती ताजीतवानी वाटतात. त्यामुळे कुठला सापेक्ष विचार न करता आयुष्यात कुठल्या गोष्टी महत्त्वाच्या आहेत आणि त्या सर्वांना कशा लागू पडतात, याचे मार्गदर्शन होते. 

ईश उपनिषदात सांगितल्याप्रमाणे ‘यस्मिन सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभुद्विजानतः’ ह्या मंत्राचा अर्थ  प्रत्येक मानव साधन नसून साध्य आहे असे त्याने मानले पाहिजे. दुसऱ्याचा वापर कसा होईल असा विचार न करता त्या व्यक्तीमुळे आपले जीवन जास्त समृद्ध झाले आहे, अशी भावना ठेवल्याने सर्वांप्रती आदर वाटू लागतो. (पान क्र ६-७) त्यामुळे लोकांशी मैत्री करणे, त्यांच्याबद्दल आपुलकी वाटणे, अडीअडचणीला समजून घेणे किंवा आपपरभाव कमी होणे, हे सर्व शक्य होते. सर्व जीव हे आत्म्याचे रूप असतात, म्हणजेच आपल्यात आणि इतरांत एकच आत्मतत्त्व निवास करत असते. ही गोष्ट लक्षात आली की आपण दुसऱ्याचा विचार करताना त्याची जात, धर्म, रंग, आर्थिक स्थिती यांचा विचार ना करता आपण त्यांच्या परिस्थितीत कसे वागू, याचा विचार करू लागतो. 

मला स्वतःला उपनिषदांचे तत्त्वज्ञान फार आकर्षित करते. आत्मतत्त्व म्हणजे काय, त्याचा शोध कसा घ्यायचा, स्वतःची ओळख कशी करून घ्यायची, आपल्यालाच जर स्वतःची ओळख नसेल, तर आपण दुसऱ्याला आपली मते कशी सांगणार? आपल्याबद्दलच्या गैरसमजुती कशा दूर करणार? आपले मत नक्की केव्हा तयार होते किंवा केव्हा पक्के होते, हे आपण कसे ठरवणार. बहुतांशी आपल्याला आपली स्वतःची ओळख असणे हे जरुरीचे असतेच. त्याशिवाय आपली जडणघडण होऊच शकत नाही. स्वतःची ओळख जशीजशी जास्त खोलात जाऊन होईल त्याप्रमाणेच आपली स्वतःचे समर्थन करण्याची, आत्मिक उन्नती आणि समाधान मिळवायची, एकाकीपणा नाहीसा करण्याची आणि जीवनातले चढउतार पार पाडण्याची क्षमतापण वाढत जाते. या आणि अशा बऱ्याच प्रश्नांची उत्तरे मिळवण्यासाठी त्यामागची भूमिका समजून घेणे जरुरी आहे. उपनिषदात अशा तात्त्विक प्रश्नांची बरीच चर्चा आहे. 

सोहम किंवा ‘सः अहं ‘ हे उपनिषदातले महत्त्वाचे तत्त्व आहे. याचा अर्थ असा की सः म्हणजे ते ब्रह्म, हे अहं म्हणजे माझ्यात सामावलेले आहे आणि हे समजून घेणे म्हणजेच आत्मतत्त्व समजून घेणे आणि ते समजून घेण्यासाठी भक्ती मार्गाने ध्यान करून किंवा ज्ञानमार्गाने विचार करून आणि कर्म मार्गाने योग्य काम करून, आपली आपल्याशी ओळख करून घेणे.  आत्मतत्त्व समजून घेऊन मोक्षापर्यंत त्याची वाटचाल कशी होते, याचे मार्गदर्शन या उपनिषदातील मंत्रात आढळते. जेव्हा आत्मा ब्रह्मात विलीन होतो, तेव्हा मोक्षप्राप्ती होते. व्यावहारिक दृष्टीने बघायचे झाले तर समोरच्या माणसाला एक आत्मा या नात्याने आदराने आणि सन्मानाने वागणे, हे समजून येते. 

केन उपनिषदात आत्म्याचे अस्तित्त्व समजून घेण्यासाठी अंगी नम्रता असणे खूप जरुरीचे सांगितले आहे. जर नम्रता नसेल, तर आपल्याला आत्म्याचे ज्ञान होत नाही. आपल्याला खूप अजून शिकायचे आहे, हि भावना असल्याशिवाय काही नवीन शिकता येत नाही.  मैत्रीचे पण गणित असेच आहे. जर आपण नम्रपणे किंवा आदराने दुसऱ्याला वागवले नाही, तर कोणी आपल्याशी मैत्री करणार नाही. ही मूल्ये अंगी बाणावी यासाठी पण कदाचित हा उपदेश केला असेल. (पान क्र ३६)

छांदोग्य आणि मैत्री उपनिषदात मनाचे महत्त्व सांगितले आहे. मन हे सर्वांचे उगमस्थान आहे. मनुष्य मनानेच पाहतो व ऐकतो. (पान क्र ११३) आपले लक्ष नसेल, तर डोळ्यासमोरची गोष्ट देखील जशी नजरेत भरत नाही, त्याप्रमाणेच डोळ्याने बघून देखील मनाची साथ नसेल, तर न दिसल्यासारखेच होते. आपल्या मनात असलेल्या भावना या सगळ्या मनाच्या नियंत्रणाखाली असल्याने कशाची भीती वाटून घ्यायची आणि कशाचे कौतुक वाटून घ्यायचे, हे पण आपल्या हातीच असते. मनावर बुद्धीचे नियंत्रण असल्याने बुद्धीचा वापर करून आपण चांगला निर्णय घेऊ शकतो. अर्थात हे सर्व वाटते तितके सोपे कधीच नसते. जसजसा आपला चांगले निर्णय घेण्याचा सराव वाढत जातो, त्याप्रमाणे आपला आत्मविश्वास, आत्मसम्मान आणि आत्मप्रेम वाढीस लागते. याला काही लोक अध्यात्मातील उन्नती असे देखील मानतात. ध्यानाने आणि सुविचाराने सुद्धा या गोष्टींचा सराव वाढू शकतो. अशा सरावाने आपल्याला अंतरात्म्याची ओळख वाढून काही गोष्टी वेगळ्या स्तरावरपण कळू लागतात. उदाहरणार्थ कोणाला आपण आवडतो आणि कोणाला आवडत नाही, हे कळायला आपण आपल्या मनाशी संवाद साधून पण समजू शकतो. कोण आपल्याशी खरे बोलत आहे आणि कोण दुटप्पीपणे वागत आहे, याचे ज्ञान पण होऊ शकते. त्याप्रमाणेच आपण एकटे नाही, आपल्या पाठीमागे आत्मतत्त्व खंबीर उभे आहे, याची जाणीव होऊन एकटेपणा किंवा भीती वाटणे हे कमी होते. याचा अर्थ असा नव्हे कि आपण व्यावहारिक पद्धतीने आपली काळजी घेऊ नये, पण याचा अर्थ असा होतो की जेव्हा आपल्याला आपलं स्वतःचे स्थान समजू लागते, तेव्हा आपले जीवन आनंदाने बहरून जाते आणि आपली दिनचर्या सुखकर होते. 

मुंडकोपनिषदातले एक उदाहरण देताना प्रा. रानडे म्हणतात की एका वृक्षावर जीव आणि ब्रह्म राहात असतात. जीवाला नेहमी आपण निर्बल आहोत असे वाटून दुःख व्हायचे. पण जेव्हा त्याचे ब्रह्माशी ऐक्य होते, तेव्हा तोसुद्धा अनंत शक्तीचा वाटेकरी असल्याचे त्याला जाणवते. (पान क्र २९६) तेव्हा त्याचे दुःख नाहीसे होऊन त्याला अपरिमित आनंद होतो. तशीच जेव्हा आपल्याला जाणीव होते, कि आपण एकटे नाही. आपण या सृष्टीचा भाग आहोत, आपल्या जीवनाचा हेतू सफल करण्याचा प्रयत्न आपण केला, कि आपण आनंदी होतो. तेव्हा आपल्याला चिंता ग्रासत नाहीत, किंवा एकटेपण खायला उठत नाही. त्यामुळे उपनिषदांचा सल्ला घेऊन आपण संयमाने, धैर्याने आणि नीतीने जीवनाला सामोरे जातो, तेव्हा ज्ञान आणि आनंदाचा अनुभव घेण्यास पात्र होतो. 

© लेखिका : अश्विनी मोकाशी 

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New book Explores the Role of Wisdom In Transforming Individual Lives and the World

Thank you, Dr. Linda Brown Holt, an author of fiction and non-fiction books for your kind review!

In Sapiens and Sthitaprajña, Ashwini Mokashi has written a brilliant analysis and comparison of two philosophies from different parts of the world: the stoicism of the Western philosopher Seneca (Roman 1 BCE to 65 CE) and the teachings of the Indian text, the Bhagavad Gita (ca. 400 BCE to 200 CE).

Mokashi has distilled the key ideas from these two works and presented them in ways that every thoughtful person can appreciate and enjoy. Her scholarly background has enabled the author to penetrate to the core of each work’s message, where she finds a unifying call for the cultivation and practice of wisdom in society at large and in our individual lives.

Wisdom may, in fact, be the one element missing today in our social discourse. Government officials and members of popular movements alike demonstrate every day that they have mastered the arts of contentiousness, disregard for the truth, and have the ability to spin information with the ease and facility of a skilled magician. But where is the wisdom that should be at the heart of their thoughts and deliberations? Do we need leaders who are wise people? Or are we content to be led by “wise guys”?

Using easy-to-understand language, Mokashi provides clear descriptions of Seneca and his time as well as the setting and meaning of the Bhagavad Gita, one of the most cherished works of Indian spiritual philosophy. She answers the question, “What is stoicism?”, and suggests ways, based on these ancient teachings, through which we can improve ourselves and the world around us.

The title of this book refers to the “Sapiens” in Roman philosophy, a wise person who is moderate in his or her habits and thinks before acting. The “Sthitaprajña” refers to one who is firm in judgment and wisdom. Although these ideals come from different parts of the world, the stoic teachings of Seneca and the author of the Gita have a shared universal ring of truth. Through moderation, kindness, and dedication, we, too, can experience a greater sense of unity and purpose in our lives, and pass that on to a world in need of ancient wisdom that is tried and true.  

   –Dr. Linda Brown Holt, author of Viewing Meister Eckhart through the Bhagavad Gita

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Happiness in the New Year 2020

2019 Achievements:

– Publication of the book ‘Sapiens and Sthitaprajna’
– Publication of the blog ‘ashwinimokashi.com‘ for English and Marathi articles on Philosophy and Happiness – YouTube Channel started ‘Ashwini Mokashi Talks’ https://www.youtube.com/channel/UCAOdCfuv0ZIrzGyBDt8DP-g/featured


2020 Projects Preview: – A course at the Evergreen Forum in Princeton ‘Wisdom Leads to Happiness’ to run from February to April 2020 – Research Continues on Meditation and Bhakti project covering Saints-literature in India from the 12th to 19th centuries in three languages – Marathi, Hindi and Kannada

Honors and Awards – Thank you Princeton Research Forum for the Francis Hutner Travel Grant 2019- Memorial Talk at the Bhandarkar Institute in Pune, April 17, 2019 – Op-Eds published in Indian Express and Loksatta – Indian newspapers with highest circulation- Informal discussions with the Hindu scholars at Oxford University – Talks in New Delhi, India and Princeton, NJ- Informal Talk at Florence, Italy – Many reviews published of the book ‘Sapiens and Sthitaprajna’ – The blog readership upwards of 600 in three months since starting.


Thank you Readers, for being a part of this project to spread Happiness and Wisdom about life through Philosophy!

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चांगले जीवन कसे जगावे

लेखिका : अश्विनी मोकाशी  (c)

मानवी इतिहासामध्ये संपूर्ण पृथ्वीवरील प्रत्येकजण आनंदाचा आणि सुखाचा पाठपुरावा करतो. जगातील सर्वत्र प्रचलित असलेल्या या पाठपुराव्यासंदर्भात काही सत्ये असली पाहिजेत हे गृहीत धरून मी या विषयावरील प्राचीन तत्त्वज्ञानाकडे वळले. सुखाचा रस्ता सुज्ञ आणि नैतिक निवडीतून जाईल, याची मला कल्पनाही नव्हती. जर ते प्राचीन तत्त्ववेत्तांसाठी खरे होते तर ते अजूनही सत्य आहे का? जीवनाच्या काही मूलभूत तत्त्वांपर्यंत  पोचण्यासाठी आपल्याला विविध अडथळ्यांना पार करणे शक्य आहे का, ज्यामुळे आपल्याला एक चांगले जीवन जगता येईल?


ग्रीक / रोमन तत्त्वज्ञानातील ‘सेपियन्स’, आणि गीता-उपनिषदांच्या भारतीय तत्वज्ञानात ‘स्थितप्रज्ञ ’ या नावाने ओळखल्या जाणार्‍या मानवाचा आदर्श पुढे येतो. त्यांनी आम्हाला प्रदान केलेल्या जीवन सुकर करणाऱ्या साधनांमध्ये पुढील तत्त्वे आढळतात – आपल्या परिस्थितीपासून अलिप्त राहणे, सखोल  विचार करून योग्य निर्णय घेणे, आपल्या विचारांना आणि कल्पनांना तपासून घेऊन  त्यांचे विश्लेषण करणे , स्वतःवर किंवा इतरांवर अन्याय न करता नैतिक रीतीने वागणे, आपल्या नकारात्मक भावनांवर  विशेषतः राग, शोक आणि चिंता यांवर नियंत्रण मिळवणे, काही अपरिहार्य गोष्टी निसर्गाचा नियम म्हणून स्वीकारणे आणि सर्वात महत्त्वाचे म्हणजे निसर्गाचे कायदे, विज्ञानाची तथ्ये आणि आपली भावनिक रचना समजून घेणे. जेव्हा हे एक अशक्य काम आहे असे वाटते, तेव्हा जसे अर्जुनाने गीतेतील भगवान श्रीकृष्णाशी सल्लामसलत केली, याचा विचार करावा; किंवा सॉक्रेटिसने बाजारपेठेतील इतर तथाकथित सुज्ञ लोकांचा सल्ला घेतला आणि सॉक्रॅटिक पद्धतीने विचारपूस करुन त्यांच्या तथाकथित विचारांना कसे आव्हान दिले, त्याचा विचार करावा आणि आपले विचार तपासून पाहावेत. 


या मार्गावरील मुख्य अडथळे म्हणजे भावनाग्रस्त होणे  किंवा नकारात्मक भावना अंगीकारणे. आजकाल आपण बघतो की तरुण लोकांना चिंता, नैराश्य आणि उदासिनता खूप सतावते. कधी आपण एखादी मोठी संधी गमावल्यामुळे किंवा कधी पराभूत झाल्याने असे वाटणे साहजिक आहे. जे कामात अपयशी ठरतात, त्यांच्या बाबतीत हे औदासिन्य नजरेस येते, परंतु जे अत्यंत यशस्वी आहेत त्यांच्या बाबतीतही हे घडू शकते . त्याचे कारण असे आहे की कोणत्याही प्रकारची नकारघंटा स्वीकार करणे कठीण जाते.  ही नकारघंटा कधी आपल्या कारकीर्दीत आपल्या कामाच्या ठिकाणी ऐकू येते, तर कधी आपल्या कुटुंबात किंवा आपल्या प्रेम-जीवनात ऐकू येते. अशा वेळेला थोडे परिस्थितीपासून दूर जाऊन, थोडा अलिप्तपणे विचार केला की नव्याने त्या परिस्थितीकडे बघण्यास, आपली नवीन ध्येय निश्चित करण्यास आणि ते ध्येय योग्य आहे की नाही हे ठरवण्यास मदत होईल. म्हणून अलिप्तपणे आणि धोरणात्मक विचारसरणीमुळे आपल्याला योग्य काय आणि अयोग्य काय, हे समजायला  मदत होईल. ते शहाणपण आहे. गीतेमध्ये हे ‘वैराग्य’ आणि स्टोइसिझम मध्ये ते ‘आपेथिया’ या नावाने ओळखले जाते. अलिप्तपणा शिकणे किंवा शिकवणे खूप अवघड आहे परंतु तरीही जीवनातील चढउतारांत अलिप्त राहणे आणि शांत राहणे हे फारच गरजेचे आहे, अन्यथा उलथापालथ झाल्याशिवाय राहणार नाही.


तसं बघायला गेलं तर ,आपण आता एका जागतिक खेड्यात राहत आहोत, जिथे वेगवेगळ्या ठिकाणाहून लोकं येतात आणि कायमचे वास्तव्य करतात. कुठल्याही शहरी भागात काही लोकं तिथले रहिवासी असतात आणि काही दुसरीकडून आलेले असतात. त्यामुळे कल्पनांची देवाणघेवाण होते आणि संस्कृतीचे मिश्रण नेहमीच आढळते. पण त्यामुळे सर्व प्रकारचे संभ्रम पण वाढतात. कुठल्या पद्धती योग्य आणि कुठल्या अयोग्य या गोंधळांतून मार्ग काढण्यासाठी मूल्यांवर आधारित, तत्त्वांवर आधारित परिस्थिती निर्माण करून, जिथे सार्वत्रिक मूल्यांवर सहमती दिली जाते, तिथे जीवनाचा सूर गवसतो. त्या दृष्टीने तुलनात्मक तत्त्वज्ञान फार उपयुक्त ठरते, विशेषत: जेव्हा पौर्वात्य आणि पाश्चिमात्य  प्राचीन ग्रंथ कोणत्या मूल्यांचा पाठपुरावा करावा हे सांगतात आणि सर्वांसाठी चांगले जीवन कसे जगावे या मुद्द्यांवर त्यांचे एकमत झालेले दिसते, तेव्हा तिथे तथ्य आहे हे लक्षात येते. गीता आणि स्टोइक सेनेका यांच्या ‘ज्ञानी’ व्यक्तीच्या संकल्पनेत उल्लेखनीय साम्य आढळून येते , यासाठी योग्य कृती ठरविण्याकरिता बौद्धिक अचूकपणाचा वापर करणे (ज्ञानमार्ग) आवश्यक आहे, त्यानंतर योग्य कृती अंमलात आणणे (कर्ममार्ग) आणि सर्वांना नीट समजून देणे हे फायदेशीर ठरेल. 


आपल्या बोलण्यामध्ये आणि कृतीमध्ये जेव्हा साधर्म्य असते, त्याचबरोबर सकारात्मक भावनांचा वापर किंवा नकारात्मक भावनांचा अभाव असतो, तेव्हा मनाची शांती आणि आनंदाची स्थिती निर्माण होते. आपण जितके अधिक त्या प्रकारे राहण्याचा प्रयत्न करतो, तितका जास्त प्रमाणात आनंद घेत असतो. हा सिद्धांत इच्छापूर्तीच्या कल्पनेपेक्षा भिन्न आहे. आनंदी होण्यासाठी संपत्ती, आरोग्य, सौंदर्य आणि मजेची उद्दीष्टे पूर्ण केल्याने आपल्याला थोडाफार क्षणिक आनंद होईल आणि एका विशिष्ट वयात ते महत्वाचे सुद्धा आहे, परंतु दीर्घकाळपर्यंत तणावरहीत आणि सुखी होण्याचा ज्ञान मार्ग हा नाही. ज्ञान मार्गाने मिळालेल्या सुखाचे अनुसरण करताना, आपल्या  विचारांना सतत तपासून घेतले पाहिजे, धोरणात्मक असले पाहिजे आणि आपल्या कृतीच्या दीर्घकालीन परिणामाबद्दल विचार केला पाहिजे. उदाहरणार्थ, आपल्या  स्वप्नातील कार विकत घेतल्यामुळे जर बरेच वर्षे दिवाळखोरीत राहावे लागणार असेल, तर त्या कार विकत घेण्याला काही किंमत राहणार नाही. त्याचप्रमाणे एखादी उच्च पगाराची नोकरी स्वीकारली, पण त्यासाठी लागणारी मेहनत किंवा परिश्रम करण्याची आणि गरज पडल्यास प्रवास करून कामाच्या ठिकाणी एकाकी जीवन जगण्याची तयारी नसेल, तर अशी  नोकरी घेणे ही योग्य संधी असू शकत नाही. अशा प्रकारे तर तम् भावाचा विचार केल्यावर लक्षात येते की, इतर काहीही नसले तरी, ज्ञान मार्गाचा अवलंब केल्याने आपल्याला आपले जीवन योग्य दिशेने नेता येईल आणि त्याचबरोबर नीतीने आणि न्यायाने वागून आपले सर्वांचे  जीवन दीर्घकाळपर्यंत तणावमुक्त, सुखी आणि समृद्ध करण्याचा जास्तीतजास्त प्रयत्न करता येईल.

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Wisdom for a Happy Marriage – a Parody or a Perspective?

By Ashwini Mokashi ©

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A happy marriage in modern times may be an oxymoron, or the institution of marriage may be on the verge of extinction looking at the divorce rates in the US. One prominent reason I see, is that a marriage tries to join two people or two families and expects them to grow and develop in that joint fashion, while keeping up with the societal norms of individuality, individual happiness, individual freedom, etc. So, if thinking about individual fulfilment is the goal, then a joint or united happiness is a contradiction in terms. If the united happiness for the two people joined in marriage is the goal, then individual freedom and individual growth and happiness constitutes a logical fallacy, also known as reductio ad absurdum. And yet, we don’t see it as a fallacy, but as something glorious to look forward to. The concept of marriage exists between not just heterosexual couples, but also homosexual couples. People spend a ton of their savings on this joyous occasion of wedding, knowing that it may lead nowhere. So, what is the compelling argument for getting married and for staying married?

One can say that the getting married part is based on attraction, falling in love, a desire to be with one’s beloved, fulfilment of a dream, a chance to shower one’s affection on someone who smiles and doesn’t frown, or just to get rid of loneliness in one’s life. Agreed. Two people are joined in love and matrimony. Now comes the part of staying together or taking decisions together and that starts to become complicated. Things start withering away even before the actual wedding, as a lot of decisions need to be made about how to get married, whom to invite, how much to spend. None of this is pleasant. Someone must give and that someone is not happy. Then there is the fiasco about how ‘we need to talk’ and how much people should be expected to ‘give’ for the sake of marriage and how much should they expect to receive for being ‘in the marriage’.

Things only go downhill from here. The future of marriage on the wedding day and beyond does not look like a happy proposition. But the whole point of being married was to seek happiness, (not to mention security, children, fulfillment of various needs with the help of one’s partner). So, where did things go wrong? Being a student of ancient wisdom, I decided to consult the wisdom experts I had studied – Stoic Seneca and the Gita – to see if I could get their help in improving the expectations in the marriage, to save this dying institution – which couldn’t have possibly survived for centuries, to rescue it from the clutches of evolutionary biologists – who believe every man will be eyeing a younger woman for replicating his gene-pool, to help all women who believe that there is a better man out there but not the one they are married to. Now to be honest, the teachings of Stoicism or that of the Gita are hardly a model of conjugal bliss, as we understand it today. Having said that, here is how I interpreted their infallible wisdom in my own fallible way:

The Gita has a five-point plan for seeking happiness as follows:

  1. Sva-dharma or doing one’s own duty: This involves making sure that the household chores are done. For example, earning money, looking after kids or elders, whatever one’s ‘married-duties’ maybe. One is expected to not only fulfil but also excel in fulfilling one’s duties.
  2. Shraddha or faith: It is important to have undying faith that the marriage will survive – no matter how grim the scenario is. Ignorance about problems can be blissful sometimes.
  3. Samatvam or equanimity towards pleasure and pain: If the spouse is being very romantic, enjoy it, but remember it is not going to last. If the spouse is being miserable, ignore the other person – as that is also not going to last. Keeping the sense of humor alive at such moments goes a long way.
  4. Anasakti or non-attachment: One decides to get married for having feelings for one’s spouse, but the marriage itself is an exercise in non-attachment. Getting too involved gives rise to dependence, lack of trust, giving them too much importance, degrading oneself in our own eyes, jealousy and an invitation to misery. By practicing non-attachment, one is safeguarding one’s sense of dignity, one’s interests, keeping options open – personal or professional, and enjoying the good moments.
  5. Shanti or tranquility – One enjoys moments of peace, when one feels safe in the relationship. If the marriage succeeds, it is great. If not, one needs to practice using wisdom more often and emotional reactions – less so.  Not to mention, it was good to still have the job, life, friends, interests, hobbies!

Now let us turn to Seneca, a Stoic philosopher. Stoics don’t think much about falling in love, but they do support marriage and Seneca himself enjoyed a faithful and good marriage. Let us see his advice for being wise and happy, and how it can be applied in the arena of marriage:

  1. Kathekonta or appropriate actions: This requires always saying the right thing and no more. It is ok to say, the dinner was delicious. It is not ok to add, but I would have preferred it earlier or later, colder or hotter. Any such comments are forbidden, since they are not appropriate.
  2. Oikeiosis or what belongs to oneself: This means that one needs to belong to one’s newly formed family, to one’s community – the friends that both share together, and to a wider society, including one’s own separate sphere.
  3. Arete or virtue: Be good to one’s spouse. Remember why we chose them over the others, think about their good qualities and not those, one dislikes. Instead of criticizing, make a statement of what one feels grateful for.
  4. Apatheia or detachment: This is the most difficult step, which requires one to stay detached, so that one doesn’t take any criticism personally. Likewise, it is also necessary to remember that the fun moments have a fleeting nature, so hold on to those memories.
  5. Laws of nature: Understanding this requires us to understand that men will be tempted by younger and prettier women – just goes with being a man. Likewise, women will be tempted with offers of love, affection and pampering – that is what they need. So long as one is aware of the other person’s needs and there is a way to fulfil those needs, it is possible to protect one’s marriage through these traps.
  6. Eudaimonia or Happiness: Marriage calls for joint happiness. If one accepts that joint happiness requires sacrificing some amount of individual happiness, then a ‘happy marriage’ is a possible imaginable entity. If joint happiness is not a possible goal, then ‘a happy marriage’ is a mere oxymoron. For example, a career success for one person would imply the success for both, a personal milestone of weight-loss would still mean success for both. Likewise, a job-loss would be a problem for both, investments and/or kids not doing well would be a failure for both. While there is much to gain from the joint activity, there is also much to lose in a narrow individual sense in staying together.

Hence bringing wisdom in a marriage has the capacity to make it happy, but not bringing wisdom in a marriage seems like a continuous struggle and taking chances of surviving as a couple or as a family, six of one, half a dozen of the other. Did I say it was fun?

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